भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)
Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary
महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा
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ग्रहों की वक्री तथा अतिचारी गति
सूर्य, चन्द्र, राहु तथा केतु—इनचार ग्रहों के अतिरिक्त शेष पांचों ग्रह—अर्थात् मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र और शनि—कभी-कभी वक्री अथवा अतिचारी हो जाते हैं। ग्रह के राशियों में क्रमशः परिभ्रमण को 'मार्गी', शीघ्रतापूर्वक परिभ्रमण को 'अतिचारी' तथा अगली राशि की ओर बढ़ने की बजाय पीछे की राशि में लौट पड़ने को 'वक्री' गति कहा जाता है। अतिचारी तथा वक्री ग्रह एक राशि पर अपने भ्रमण को निश्चित अवधि में पूरा करने की बजाय कुछ आगे पीछे भी हो जाते हैं। आकाश-मण्डल में किस समय कौनसा ग्रह मार्गी, वक्री अथवा अतिचारी चल रहा है, इसका ज्ञान पंचांग देखकर हो सकता है। जातक के जन्म के समय जो ग्रह आकाश-मण्डल में जिस गति से भ्रमण कर रहा होता है उसका वैसा ही प्रभाव जातक के ऊपर जीवन भर पड़ता रहता है।
ग्रहों की नैसर्गिक-मैत्री
कौनसा ग्रह किस ग्रह का मित्र, सम अथवा शत्रु है, इसे नीचे प्रदर्शित 'निसर्ग मैत्री चक्र' में देख कर समझ लेना चाहिए—
निसर्ग मैत्री चक्र
| सम्बन्ध का स्वरूप | ग्रहों के नाम | ||||||
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| सूर्य | चन्द्र | मंगल | बुध | गुरु | शुक्र | शनि | |
| मित्र | चन्द्र<br>मंगल<br>बुध | सूर्य<br>बुध | सूर्य<br>चन्द्र<br>गुरु | सूर्य<br>शुक्र | सूर्य<br>चन्द्र<br>मंगल | बुध<br>शनि | बुध<br>शुक्र |
| सम | बुध | मंगल<br>बुध<br>शुक्र<br>शनि<br>बुध | शुक्र<br>शनि | मंगल<br>गुरु<br>शनि | शनि | मंगल<br>गुरु | बुध |
| शत्रु | शुक्र<br>शनि | बुध | चन्द्र | शुक्र<br>बुध | सूर्य<br>चन्द्र | सूर्य<br>चन्द्र<br>मंगल | |
| टिप्पणी (१)—कुछ विद्वानों के मतानुसार चन्द्रमा गुरु से शत्रुता मानते हैं। |
३२ (२) राहु केतु छायाग्रह हैं, अतः 'निसर्ग मैत्री चक्र' में इनका उल्लेख नहीं किया गया है। परन्तु ये दोनों ग्रह शुक्र तथा शनि से मित्रता मानते हैं तथा सूर्य, चन्द्र, मंगल, एवं गुरु—इन चारों से शत्रुता रखते हैं। बुध इन दोनों के लिए सम है। इसी प्रकार सूर्य, चन्द्र, मंगल और गुरु—ये चारों ग्रह राहु तथा केतु से शत्रुता मानते हैं, बुध इन दोनों से समभाव रखता है तथा शुक्र और शनि इन दोनों से मित्रता मानते हैं। ग्रहों के अंश प्रत्येक ग्रह के ३० अंश होते हैं। 'जातक के जन्म के समय कौनसा ग्रह कितने अंश पर था', इसका ज्ञान उस समय के पंचांग द्वारा ज्ञात हो सकता है। इस विषय में किसी ज्योतिषी से जानकारी प्राप्त कर लेनी चाहिए। ३ से ६ अंश तक का ग्रह किशोरावस्था का, १० से २२ अंश तक युवावस्था का, २३ से २८ अंश तक वृद्धावस्था का तथा २९ से २ अंश (२९, ३०, १ और २) तक मृतक अवस्था का माना जाता है। किशोर एवं वृद्धावस्था वाले ग्रह बालक पर अपना प्रभाव अल्प परिमाण में तथा युवावस्था वाले ग्रह पूर्ण परिमाण में प्रकट करते हैं। मृतक-अवस्था वाले ग्रहों का प्रभाव न के बराबर होता है। जन्म कुण्डली के द्वादशभाव जन्म-कुण्डली इस बात की परिचायक है कि जातक के जन्म के समय आकाश- मण्डल में कौन-सा ग्रह, किस राशि में, कितने अंशों पर परिभ्रमण कर रहा था। बारह राशियों के प्रतीक रूप जन्म-कुण्डली में बारह खाने होते हैं, जिन्हें 'भाव', 'स्थान' अथवा 'घर' आदि नामों से पुकारा जाता है। जन्म-कुण्डली के द्वादशभावों के नाम निम्नलिखित हैं— (१) तनु, (२) धन, (३) सहज, (४) सुहृद्, (५) पुत्र, (६) रिपु, (७) जाया (स्त्री), (८) आयु, (९) धर्म, (१०) कर्म, (११) आय (लाभ) और (१२) व्यय।
३३ जन्म-कुण्डली के द्वादशभाव [कुण्डली चक्र: प्रथम (तनु), द्वितीय (धन), तृतीय (सहज), चतुर्थ (सुहृद्), पंचम (पुत्र), षष्ठ (रिपु), सप्तम (जाया), अष्टम (आयु), नवम (धर्म), दशम (राज्य), एकादश (लाभ), द्वादश (व्यय)] ३ उक्त नामों को अन्य नामों के भी पुकारा जाता है। द्वादश भावों के विभिन्न नाम तथा किस भाव द्वारा किन-किन विषयों का विचार किया जाता है, इसे निम्नानुसार समझना चाहिए— (१) पहला भाव—इसे प्रथम, तनु, लग्न, केतु आदि नामों से भी पुकारा जाता है। इसके द्वारा जातक के स्वरूप, आकृति, आयु, चिह्न, जाति, मस्तिष्क, विवेक, शील, सुख-दुःख आदि के विषय में विचार किया जाता है। लग्नेश की स्थिति एवं बलाबल के आधार पर जातक को कार्यकुशलता एवं जातीय-उन्नति-अवनति का ज्ञान भी इसी भाव से प्राप्त होता है। इस भाव का कारक 'सूर्य' है। यदि इस भाव में मिथुन, कन्या, तुला अथवा कुम्भ—इनमें से कोई राशि हो तो उसे बलवान माना जाता है। (२) दूसरा भाव—इसे द्वितीय, धन, वित्त, पणफर आदि नामों से भी पुकारा जाता है। इसके द्वारा जातक के स्वर, सौन्दर्य, सत्यवादन, आंख, नाक, कान, कुल, कुटुम्ब, मित्र, सुखोपभोग, बन्धन, गायन, क्रय-विक्रय, रत्न, स्वर्ण-चाँदी, धन, संचित पूँजी आदि के विषय में विचार किया जाता है। (३) तीसरा भाव—इसे तृतीय, सहज, पराक्रम, भ्रातृ, आपोक्लिम आदि नामों से भी पुकारा जाता है। इसके द्वारा जातक के पराक्रम, शौर्य, धैर्य, साहस, कर्म, सहोदर, सेवक, आयुष्य, काम, योगाभ्यास तथा क्षय-श्वास, दमा आदि रोगों के सम्बन्ध में विचार किया जाता है। (४) चौथा भाव—इसे चतुर्थ, सुहृद्, सुख, केन्द्र आदि नामों से भी पुकारा
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जाता है। इसके द्वारा जातक की माता, पिता का सुख, अन्तःकरण, घर, गांव, उपवन, चतुष्पद, सम्पत्ति, वाहन, निधि, दयालुता, उदारता, छल-कपट तथा यकृत् एवं उदर रोग आदि के सम्बन्ध में विचार किया जाता है। यह स्थान विशेष कर 'माता' का है। इस भाव के कारक चन्द्रमा तथा बुध हैं। (५) पाँचवाँ भाव—इसे पंचम, बुध, विद्या, पणफर, त्रिकोण आदि नामों से भी पुकारा जाता है। इसके द्वारा जातक की विद्या, बुद्धि, सन्तान, विनय, नीति, प्रबन्ध-कुशलता, देवभक्ति, धन प्राप्ति के उपाय, आकस्मिक-धन की प्राप्ति, नौकरी छूटना, मामा का सुख, हाथ का यश तथा बस्ति, गर्भाशय, मूत्रपिण्ड आदि के विषय में विचार किया जाता है। इस भाव का कारक बुध है। (६) छठा भाव—इसे षष्ठ, रिपु, त्रिक, उपचय, आपोक्लिम आदि नामों से भी पुकारा जाता है। इसके द्वारा जातक के शत्रु, चिन्ता, सन्देह, जागीर, यश, मामा की स्थिति, गुदा तथा पीड़ा, व्रण, रोग आदि के विषय में विचार किया जाता है। इस भाव के कारक शनि तथा मगल हैं। (७) सातवाँ भाव—इसे सप्तम, जाया, केतु आदि नामों से भी पुकारा जाता है। इसके द्वारा जातक की स्त्री, कामेच्छा, काम चिन्ता, रमणशक्ति, विवाह, स्वास्थ्य, मित्र, दैनिक आय, व्यवसाय, झगड़े-झंझट, जननेन्द्रिय तथा बवासीर की बीमारी आदि के सम्बन्ध में विचार किया जाता है। इस भाव में 'वृश्चिक' राशि को बलवान मानते हैं। (८) आठवाँ भाव—इसे अष्टम, आयु, जीवन, मृत्यु, चतुरस्र, पणफर आदि नामों से भी पुकारा जाता है। इसके द्वारा जातक की आयु, जीवन, मृत्यु, मृत्यु के कारण, मानसिक चिन्ताएं, पुरातत्त्व, संकट, ऋण, समुद्र-यात्रा, जननेन्द्रियों के रोग आदि के सम्बन्ध में विचार किया जाता है। इस भाव का कारक 'शनि' है। (९) नवाँ भाव—इसे नवम, धर्म, भाग्य, त्रिकोण आदि नामों से पुकारा जाता है। इसके द्वारा जातक के पुण्य, धर्म, तप, शील, तीर्थ-यात्रा, दान, प्रवास, विद्या, मानसिक वृत्ति, पिता का सुख एवं भाग्योदय आदि के सम्बन्ध में विचार किया जाता है। इस भाव के कारक 'सूर्य' तथा 'गुरु' हैं। (१०) दसवाँ भाव—इसे दशम, कर्म, राज्य, केन्द्र आदि नामों से भी पुकारा जाता है। इसके द्वारा जातक के ऐश्वर्य-भोग, यश, नेतृत्व, प्रभुत्व, सम्मान, राज्य- संबंध व्यवसाय, नौकरी, अधिकार तथा पिता के सम्बन्ध में विचार किया जाता है।
३५ इस भाव में मेष, वृष तथा सिंह राशियां, धनु राशि का उत्तरार्द्ध तथा मकर राशि का पूर्वार्द्ध बलवान होता है । इस भाव के कारक सूर्य, बुध, बुध तथा शनि हैं । (११) ग्यारहवां भाव— इसे एकादश, लाभ, आय, उपचय, पणफर आदि नामों से भी पुकारा जाता है । इसके द्वारा जातक की आय, सम्पत्ति, ऐश्वर्य, रत्न, वाहन, मांगलिक-कार्य आदि के सम्बन्ध में विचार किया जाता है । इस भाव का कारक 'गुरु' है । (१२) बारहवां भाव— इसे द्वादश, व्यय, त्रिक आदि नामों से भी पुकारा जाता है । इसके द्वारा जातक के व्यय, व्यसन, दान, बाहरी-सम्बन्ध, यात्रा, रोग, दण्ड, हानि आदि के सम्बन्ध में विचार किया जाता है । इस भाव का कारक 'शनि' है । विभिन्न नामों से प्रमुख विचारणीय विषय निम्नांकित कुण्डली चक्र में प्रदर्शित हैं :— विभिन्न भावों के विचारणीय विषय
+-----------------------------------------------------------------------+
| तीसरा भाव: | दूसरा भाव: | पहला भाव: | बारहवाँ भाव: |
| सहोदर, धैर्य, | धन, कुटुम्ब | शरीर, आकृति, | व्यय, हानि, |
| पराक्रम | | मस्तिष्क, जाति, | दण्ड |
|-----------------+-----------------+ आयु, विवेक, शील +-----------------|
| चौथा भाव: | | ग्यारहवाँ भाव:|
| माता, सुख, भूमि, भवन, सवारी, +--------------------+ आय, लाभ, |
| सम्पत्ति, दया, दान | दसवाँ भाव: | सम्पत्ति |
|-----------------+-----------------+ राज्य, पिता, कर्म,+-----------------|
| पाँचवाँ भाव: | छठा भाव: | व्यवसाय, नौकरी, | नवॉँ भाव: |
| सन्तान, बुद्धि,| शत्रु, रोग, | अधिकार, यश | धर्म, भाग्य, |
| विद्या | चिन्ता, मामा, +--------------------+ तीर्थ, दान |
| | कष्ट | सातवाँ भाव: +-----------------|
| | | स्त्री, विवाह, | आठवाँ भाव: |
| | | प्रेम, दैनिक आय, | जीवन, मृत्यु, |
| | | स्वास्थ्य, मित्र, | पुरातत्त्व, |
| | | झगड़े | ऋण, संकट |
+-----------------------------------------------------------------------+
विभिन्न भाव के कारक ग्रहों को आगे दिए गए कुण्डलीचक्र में प्रदर्शित किया गया है—
१. प्रथम खण्ड: लग्न एवं द्वितीय भाव में नवग्रह स्थिति फल एवं पूर्वजन्म कर्म
३६ विभिन्न भावों के कारक
| द्वितीय | प्रथम | द्वादश | | | सूर्य | शनि | | तृतीय | चतुर्थ | एकादश | | | चन्द्र, बुध | गुरु | | | दशम | | | | सूर्य, बुध, गुरु,| | | | शनि | | | पंचम | सप्तम | नवम | | गुरु | षष्ठ | सूर्य, गुरु | | | शनि, मंगल | अष्टम: शनि | ---------------------------------------------------- ५ भावों की त्रिकोण, केन्द्रादि संज्ञा भावों की (१) त्रिकोण, (२) केन्द्र, (३) पणफर, (४) आपोक्लिम तथा (५) मारक—ये पांच विशिष्ट संज्ञाएँ भी हैं, इनके विषय में नीचे लिखे अनुसार समझना चाहिए— (१) त्रिकोण—पांचवें तथा नवें भाव को 'त्रिकोण' कहते हैं। (२) केन्द्र
३७ त्रिकोणादि बोधक चक्र २ पणफर, मारक (आपोक्लिम) | १२ आपोक्लिम ३ आपोक्लिम | १ केन्द्र | ११ पणफर (आपोक्लिम) ४ केन्द्र | १० केन्द्र (पणफर) ५ त्रिकोण पणफर | ७ केन्द्र मारक | ९ त्रिकोण आपोक्लिम ६ आपोक्लिम (पणफर) | ८ पणफर ६ टिप्पणी—मतान्तरों को कुण्डली चक्र के कोष्ठकों में प्रदर्शित किया गया है। मूल त्रिकोण निम्नानुसार जो ग्रह जिस राशि से जितने अंश पर हो उसे सुख त्रिकोण-स्थित समझना चाहिए— १. सूर्य—सिंह राशि में १ से २० अंश तक। २. चन्द्र—वृष राशि में ४ से ३० अंश तक। ३. मंगल—मेष राशि में १ से १८ अंश तक। ४. बुध—कन्या राशि में १ से १५ अंश तक। ५. गुरु—धनु राशि में १ से १३ अंश तक। ६. शुक्र—तुला राशि में १ से १० अंश तक। ७. शनि—कुम्भ राशि में १ से २० अंश तक। टिप्पणी—राहु को कर्क राशि में तथा केतु को मकर राशि में मूल त्रिकोण गत माना जाता है।
३८ मूल त्रिकोण की राशि एवं ग्रह-बोधक चक्र
| ग्रह | सूर्य | चन्द्र | मंगल | बुध | बुध | शुक्र | शनि | राहु | केतु |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| राशि | सिंह<br>१<br>से<br>२०<br>अंश<br>तक | वृष<br>४<br>से<br>३०<br>अंश<br>तक | मेष<br>१<br>से<br>१८<br>अंश<br>तक | कन्या<br>१<br>से<br>१५<br>अंश<br>तक | धनु<br>१<br>से<br>१३<br>अंश<br>तक | तुला<br>१<br>से<br>१०<br>अंश<br>तक | कुम्भ<br>१<br>से<br>२०<br>अंश<br>तक | कर्क | मकर |
| नीचे की पहली ६ उदाहरण कुण्डलियों में विभिन्न ग्रहों को उनके मूल त्रिकोण | |||||||||
| में स्थित अलग-अलग दिखाया गया है। अन्तिम उदाहरण कुण्डली में सभी ग्रहों को | |||||||||
| एक साथ अपनी-अपनी मूल त्रिकोण राशियों में स्थित दिखाया गया है। ये सभी | |||||||||
| कुण्डलियां मेष लग्न की हैं। इन्हीं के आधार पर अन्य लग्न वाली कुण्डलियों के | |||||||||
| विषय में भी समझ लेना उचित है— | |||||||||
| मूल त्रिकोणस्थ 'सूर्य' | |||||||||
| (मेष लग्न की कुण्डली: पञ्चम भाव (सिंह राशि) में 'सूर्य') | |||||||||
| मूल त्रिकोणस्थ 'चन्द्र' | |||||||||
| (मेष लग्न की कुण्डली: द्वितीय भाव (वृष राशि) में 'चन्द्र') | |||||||||
| मूल त्रिकोणस्थ 'मंगल' | |||||||||
| (मेष लग्न की कुण्डली: प्रथम भाव (मेष राशि) में 'मंगल') | |||||||||
| मूल त्रिकोणस्थ 'बुध' | |||||||||
| (मेष लग्न की कुण्डली: षष्ठ भाव (कन्या राशि) में 'बुध') |
३६ मूल त्रिकोणस्थ 'गुरु' बुध त्रिकोणस्थ 'शुक्र' [कुण्डली २१ : ९ (धनु) में गुरु] [कुण्डली २२ : ७ (तुला) में शुक्र] सुख त्रिकोणस्थ 'शनि' मूल त्रिकोणस्थ 'राहु' [कुण्डली २३ : ११ (कुम्भ) में शनि] [कुण्डली २४ : ४ (कर्क) में राहु] मूल त्रिकोणस्थ 'केतु' मूल त्रिकोणस्थ 'सभी ग्रह' [कुण्डली २५ : १० (मकर) में केतु] [कुण्डली २६ : १-मं., २-चं., ४-रा., ५-सू., ६-बु., ७-शु., ९-गु., १०-के., ११-श.] ग्रहों की उच्च स्थिति कौनसा ग्रह किस राशि के कितने अंश बीत जाने पर उच्च का माना जाता है, इसे निम्नानुसार समझना चाहिए— १. सूर्य—'मेष' राशि के १० अंश पर। २. चन्द्र—'वृष' राशि के ३ अंश पर। ३. मंगल—'मकर' राशि के २८ अंश पर। ४. बुध—'कन्या' राशि के १५ अंश पर।
४० ५. गुरु—'कर्क' राशि के ५ अंश पर । ६. शुक्र—'मीन' राशि के २७ अंश पर । ७. शनि—'तुला' राशि के २० अंश पर । टिप्पणी—कुछ विद्वान् मिथुन राशि के १५ अंश पर तथा कुछ वृष राशि में 'राहु' को उच्च मानते हैं। इसी प्रकार, कुछ के मत में धनु राशि के १५ अंश पर तथा कुछ वृश्चिक राशि में 'केतु' को उच्च का मानते हैं। ग्रहों की नीच स्थिति जिस ग्रह को जिस राशि के जितने अंशों पर उच्च का माना जाता है, उससे सातवीं राशि पर उतने ही अंशों में वह नीच का माना जाता है। यथा— १. सूर्य—'तुला' राशि के १० अंश पर । २. चन्द्र—'वृश्चिक' राशि के ३ अंश पर । ३. मंगल—'कर्क' राशि के २८ अंश पर । ४. बुध—'मीन' राशि के १५ अंश पर । ५. गुरु—'मकर' राशि के ५ अंश पर । ६. शुक्र—'कन्या' राशि के २७ अंश पर । ७. शनि—'मेष' राशि के २० अंश पर । टिप्पणी—कुछ विद्वानों के मतानुसार 'राहु' धनु राशि के १५ अंश पर तथा कुछ के मतानुसार वृश्चिक राशि में नीच का माना जाता है। इसी प्रकार, कुछ के मत में मिथुन राशि के १५ अंश तक तथा कुछ वृष राशि में 'केतु' को नीच का मानते हैं। ग्रहों का बलाबल ग्रहों के बल चार प्रकार के कहे गये हैं— १. सर्वोच्चबली—उच्च का होने पर । २. उच्च बली—मूल त्रिकोण में होने पर । ३. बली—स्वक्षेत्री (अपने घर) का होने पर । ४. निर्बल—नीच का होने पर । टिप्पणी—जो ग्रह जिस राशि का स्वामी होता है, यदि वह उसी राशि में बैठा हो तो उसे 'स्वग्रही' अथवा 'स्वक्षेत्री' कहा जाता है। विभिन्न ग्रहों के उच्च क्षेत्रीय, मूल त्रिकोणस्थ, स्वक्षेत्री तथा नीच का होने के सम्बन्ध में और अधिक स्पष्टता को नीचे लिखे अनुसार समझ लेना चाहिए—
४१ १. सूर्य—'सिंह' राशि स्थित सूर्य स्वक्षेत्री होता है। सिंह राशि के १ से २० अंश तक उसका मूलत्रिकोण, तथा २१ से ३० अंश तक स्वक्षेत्र माना जाता है। मेष राशि के १० अंश तक उच्च का और तुला राशि के १० अंश तक नीच का होता है। २. चन्द्र—'कर्क' राशि स्थित चन्द्र स्वक्षेत्री होता है। वृष राशि के ३ अंश तक उच्च का, एवं वृष राशि के ४ से ३० अंश तक मूलत्रिकोण स्थित माना जाता है। वृश्चिक राशि के ३ अंश तक नीच का होता है। ३. मंगल—'मेष' अथवा 'वृश्चिक' राशि में स्थित मंगल स्वक्षेत्री होता है, परन्तु मेष राशि के १ से १० अंश तक मूलत्रिकोणगत तथा ११ से ३० अंश तक स्वक्षेत्री माना जाता है। मकर राशि के २८ अंश तक उच्च का तथा कर्क राशि के २८ अंश तक नीच का होता है। ४. बुध—'कन्या' अथवा 'मिथुन' राशि में स्थित बुध स्वक्षेत्री होता है, परन्तु कन्या राशि के १ से १५ अंश तक मूलत्रिकोणगत तथा १६ से ३० अंश तक स्वक्षेत्री माना जाता है। कन्या राशि के १५ अंश तक उच्च का तथा मीन राशि के १५ अंश तक नीच का होता है। इसी प्रकार कन्या राशि स्थित बुध १ से १५ अंश तक उच्च का, साथ ही १ से १५ अंश तक मूलत्रिकोणगत तथा १६ से ३० अंश तक स्वक्षेत्री माना जाता है। ५. गुरु—'धनु' अथवा 'मीन' राशि में स्थित स्वक्षेत्री होता है, परन्तु धनु राशि के १ से १३ अंश तक उसे मूलत्रिकोणगत तथा १४ से ३० अंश तक स्वक्षेत्री माना जाता है। कर्क राशि के ५ अंश तक उच्च का तथा मकर राशि के ५ अंश तक नीच का होता है। ६. शुक्र—'वृष' अथवा 'तुला' राशि स्थित शुक्र स्वक्षेत्री होता है, परन्तु तुला राशि के १ से १० अंश तक उसका मूलत्रिकोण तथा ११ से ३० अंश तक स्वक्षेत्र माना जाता है। मीन राशि के २७ अंश तक उच्च का तथा कन्या राशि के २७ अंश तक नीच का होता है। ७. शनि—'मकर' अथवा 'कुम्भ' राशि स्थित शनि स्वक्षेत्री होता है, परन्तु कुम्भ राशि के १ से २० अंश तक उसका मूलत्रिकोण तथा २१ के ३० अंश तक स्वक्षेत्र माना जाता है। तुला राशि के २० अंश तक उच्च का तथा मेष राशि के २० अंश तक नीच का होता है। ८. राहु—कन्या राशि में स्थित राहु स्वक्षेत्री होता है। मिथुन राशि के १५ अंश तक उच्च का तथा धनु राशि के १५ अंश तक नीच का माना जाता है। इसके विपरीत कुछ विद्वानों की राय में राहु वृष राशि में उच्च का तथा वृश्चिक राशि में नीच का होता है। कर्क राशि को राहु का मूल त्रिकोण माना जाता है। ९. केतु—मिथुन राशि में स्थित केतु स्वक्षेत्री होता है। धनु राशि के १५
४२
अंश तक उच्च का, मिथुन राशि के १५ अंश तक नीच का माना जाता है। इसके विपरीत कुछ विद्वानों की राय में केतु वृश्चिक राशि में उच्च का तथा वृष राशि में नीच का होता है। मकर राशि को केतु का मूलत्रिकोण माना जाता है।
ग्रहों के पद
नवग्रहों में सूर्य तथा चन्द्र को राजा, बुध को युवराज, मंगल को सेनापति, गुरु तथा शुक्र को मन्त्री एवं शनि को सेवक का पद दिया गया है। अस्तु, जिस जातक के ऊपर जिस ग्रह का जितना अधिक प्रभाव होता है, वह उसे अपने ही अनुरूप बनाने की चेष्टा करता है।
ग्रहों के ६ प्रकार के बल
ग्रहों के बल ६ प्रकार के कहे गये हैं, उन्हें निम्नानुसार समझ लेना चाहिए— (१) स्थान बल—उच्च, स्वग्रही, मित्रग्रही अथवा मूल त्रिकोणस्थ ग्रह को 'स्थान बली' माना जाता है। चन्द्र तथा शुक्र 'सम राशि' अर्थात् वृष, कर्क, कन्या, वृश्चिक, मकर एवं मीन राशि में स्थित होने पर तथा सूर्य, मंगल, गुरु, गुरु, शनि, राहु एवं केतु 'विषम राशि' अर्थात् मेष, मिथुन, सिंह, तुला, धनु एवं कुम्भ में स्थित होने पर भी 'स्थान बली' कहे जाते हैं ।
स्थान-बल निरूपण चक्र
+-------------------------------------------------------------+
| सू. \ शु. · च. / शु. · च. |
| मं. · बु. \ २ / १२ |
| गु. · श. \ सू. · मं. · बु. · गु. · श. / सू. |
| रा. · के. \ रा. · के. / मं. · बु. |
| ३ \ १ / गु. · श. |
| \ / रा. · के. |
| \ / ११ |
|-------------------------------------------------------------|
| ४ \ / १० |
| शु. · च. \ / शु. · च. |
| \ ७ / |
| सू. · मं. \ सू. · मं. · बु./ सू. · मं. |
| बु. · गु. · श. \ गु. · श. · रा./ बु. · गु. · श.|
| रा. · के. \ के. / रा. · के. |
| ५ \ / ९ |
|-------------------------------------------------------------|
| / \ |
| / \ |
| ६ / ८ \ ३७ |
| शु. · च. / शु. · च. \ |
+-------------------------------------------------------------+
उक्त उदाहरण कुण्डली की भाँति ही अन्य कुण्डलियों में भी ग्रहों के स्थानबल के विषय में समझ लेना चाहिए।
४३ (२) दिग्बल—जन्मकुण्डली में प्रथम भाव की पूर्व, चतुर्थ की उत्तर, सप्तम की पश्चिम तथा दशमभाव को दक्षिण दिशा माना जाता है । गुरु तथा गुरु प्रथमभाव अर्थात् लग्न (पूर्व दिशा) में, चन्द्रमा तथा शुक्र चतुर्थभाव (उत्तर दिशा) में, शनि सप्तमभाव (पश्चिम दिशा) में तथा मंगल दशम- भाव (दक्षिण दिशा) में स्थित हों तो उन्हें 'दिग्बली' माना जाता है। निम्नांकित उदाहरण कुण्डली में दिशाओं तथा दिग्बली ग्रहों की स्थिति को प्रदर्शित किया गया है—
+-----------------------------------------------+
| २ \ पूर्व दिशा / १२ |
| \ गु॰-बु॰ / |
| ३ \ १ / ११ |
|--------------\------------------/-------------|
| उत्तर दिशा \ / दक्षिण दिशा |
| च॰ शु॰ \ ७ / मं॰ |
| ४ \ शनि॰ / १० |
| \ पश्चिम दिशा / |
|-------------------X------------X--------------|
| ५ / \ ९ |
| / \ |
| ६ / \ ८ |
+-----------------------------------------------+
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(३) कालबल—यदि जातक का जन्म रात्रि के समय हुआ हो तो उसकी जन्मकुण्डली के ग्रहों में से (१) चन्द्रमा, (२) मंगल और (३) शनि—ये तीनों ग्रह कालबली होते हैं और यदि जातक का जन्म दिन में हुआ हो तो (१) सूर्य, (२) बुध और (३) शुक्र—ये तीनों ग्रह कालबली होते हैं। मतान्तर में, 'बुध' को दिन-रात्रि दोनों ही समय में कालबली माना जाता है । (४) नैसर्गिक बल—शनि, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, चन्द्र तथा सूर्य—ये ग्रह उत्तरोत्तर एक दूसरे से अधिक बली होते हैं। अर्थात् शनि से मंगल अधिक बलवान होता है, मंगल से बुध, बुध से गुरु, गुरु से शुक्र, शुक्र से चन्द्र तथा चन्द्र से सूर्य अधिक बलवान होता है। इसी क्रम की विपरीत स्थिति में ग्रह एक दूसरे से उत्तरोत्तर कम बलवान होते हैं अर्थात् सूर्य से चन्द्रमा कम बलवान है तथा चन्द्र से शुक्र, शुक्र से गुरु, गुरु से बुध, बुध से मंगल तथा मंगल के शनि कम बली होता है।
४४ (५) चेष्टाबल—मकर से मिथुन तक (मकर, कुंभ, मीन, मेष, वृष और मिथुन) किसी भी राशि में स्थित सूर्य तथा चन्द्रमा चेष्टाबली होते हैं और मंगल, बुध, गुरु, शुक्र तथा शनि—ये पाँचों ग्रह चन्द्रमा के साथ रहने पर चेष्टाबली होते हैं । निम्नांकित उदाहरण कुण्डली में ग्रहों के 'चेष्टाबल' को प्रदर्शित किया गया है इसी भाँति अन्य कुण्डलियों में भी समझ लें । ग्रहों का चेष्टाबल निरूपण चक्र [कुण्डली चक्र: १ भाव: चं. सू., चं. मं. बु. गु. शु. श.; २ भाव: चं. सू.; ३ भाव: चं. सू.; ४ भाव; ५ भाव; ६ भाव; ७ भाव; ८ भाव; ९ भाव; १० भाव: चं. सू.; ११ भाव: चं. सू.; १२ भाव: चं. सू.] (६) दृग्बल—जन्मकुण्डली में जिन क्रूर (दुष्ट या पाप) ग्रहों के ऊपर शुभ ग्रहों की दृष्टि पड़ती है, वे उनकी शुभ दृष्टि को पाकर 'दृग्बली' हो जाते हैं । जैसे—किसी जातक की कुण्डली में शनि पंचम भाव में बैठा हो तथा बुध लग्न में बैठा हो तो क्रूर-ग्रह शनि के ऊपर शुभ ग्रह गुरु की पूर्ण दृष्टि पड़ने के कारण शनि दृग्बली हो जाएगा । किस ग्रह की दृष्टि किन-किन भावों पर पड़ती है इसका वर्णन आगे किया गया है । नीचे का उदाहरण कुण्डली में क्रूर-ग्रहों के ऊपर शुभ ग्रहों की दृष्टि को प्रदर्शित किया गया है। इसी के अनुसार अन्यत्र भी समझ लेना चाहिए ।
४५ ग्रहों का दृग्बल निरूपण चक्र [कुण्डली चक्र: १ गुरु, २ चन्द्र, ४ मंगल, ५ शनि, ८ सूर्य, १० शुक्र] आवश्यक ज्ञातव्य—पूर्वोक्त ६ प्रकार के बलों में से किसी भी प्रकार के बल को प्राप्त बलवान ग्रह जिस भाव में बैठा होता है जातक को उस भाव का विशेष फल अपने स्वभावानुसार देता है। किसी भाव स्थित किसी भी ग्रह के फलाफल की यथार्थ जानकारी के लिए उस भाव में स्थित राशि तथा ग्रह के स्वभाव एवं बल आदि का समन्वय करके ही किसी निष्कर्ष पर पहुँचना चाहिए। ग्रहों की दृष्टि ग्रहों की दृष्टियाँ चार प्रकार की मानी गई हैं— (१) एक पाद या एक चरण दृष्टि (चतुर्थांश दृष्टि)। (२) द्विपाद या दो चरण दृष्टि (अर्धांश दृष्टि)। (३) त्रिपाद या तीन चरण दृष्टि (तीन चौथाई दृष्टि)। (४) पूर्ण दृष्टि (सम्पूर्ण दृष्टि)। जन्मकुण्डली में जो ग्रह जिस भाव में बैठा होता है, उस भाव से तृतीय तथा दशम भाव को एकपाद दृष्टि से, पंचम तथा नवम भाव को द्विपाद दृष्टि से, चतुर्थ तथा अष्टम भाव को त्रिपाद दृष्टि से तथा सप्तम भाव को पूर्ण दृष्टि से देखता है। यह नियम सभी ग्रहों पर समान रूप से लागू होता है। परन्तु इन दृष्टियों के अतिरिक्त मंगल जिस भाव में बैठा होता है, वहाँ से सप्तम भाव के अतिरिक्त चतुर्थ तथा अष्टम भाव को भी पूर्ण दृष्टि से देखता है। इसी प्रकार गुरु जिस भाव में बैठा हो, वहाँ से सप्तम भाव के अतिरिक्त पंचम तथा नवम भाव को भी पूर्ण दृष्टि से देखता है एवं शनि जिस भाव में बैठा हो, वहाँ के सप्तम भाव के अतिरिक्त
४६ तृतीय तथा दशम भाव को भी पूर्ण दृष्टि से देखता है। अपूर्ण दृष्टि को 'खण्ड दृष्टि' भी कहते हैं। राहु तथा केतु की दृष्टि अन्य ग्रहों के समान सीधी न पड़कर उल्टी पड़ती है। जैसे लग्न में बैठा हुआ मंगल तृतीय तथा दशम भाव को एक पाद दृष्टि से देखेगा तो लग्न में बैठे हुए राहु-केतु एकादश तथा चतुर्थ भाव को एक पाद दृष्टि से देखेंगे। आगे दी गई मेष राशि की उदाहरण कुण्डलियों में लग्न (प्रथम भाव) स्थित विभिन्न ग्रहों की विभिन्न भावों पर पड़ने वाली एक पाद, द्विपाद, त्रिपाद तथा पूर्ण दृष्टि को अलग-अलग प्रदर्शित किया गया है। इसी भाँति अन्यत्र भी समझ लेना चाहिए। 'सूर्य' की विभिन्न भावों पर दृष्टि [कुण्डली चक्र: लग्न (१) सूर्य; ३ भाव - एकपाद; ४ भाव - त्रिपाद; ५ भाव - द्विपाद; ७ भाव - पूर्ण; ८ भाव - त्रिपाद; ९ भाव - द्विपाद; १० भाव - एकपाद] टिप्पणी—जिस भाव में भी 'सूर्य' बैठा हो, उस भाव से उपर्युक्त आधार पर, उसकी खण्ड तथा पूर्ण दृष्टि के विषय में समझ लेना चाहिए।
४७ 'चन्द्रमा' की विभिन्न भावों पर दृष्टि [कुण्डली चक्र: चन्द्रमा प्रथम भाव में स्थित है; तृतीय एवं दशम भाव पर एकपाद दृष्टि, चतुर्थ एवं अष्टम भाव पर त्रिपाद दृष्टि, पञ्चम एवं नवम भाव पर द्विपाद दृष्टि तथा सप्तम भाव पर पूर्ण दृष्टि दर्शायी गई है।] टिप्पणी—जिस भाव में भी 'चन्द्रमा' बैठा हो, उस भाव से उपर्युक्त आधार पर, उसकी खण्ड तथा पूर्ण दृष्टि के विषय में समझ लेना चाहिए। 'मंगल' की विभिन्न भावों पर दृष्टि [कुण्डली चक्र: मंगल प्रथम भाव में स्थित है; तृतीय एवं दशम भाव पर एकपाद दृष्टि, पञ्चम एवं नवम भाव पर द्विपाद दृष्टि, अष्टम भाव पर त्रिपाद व पूर्ण दृष्टि, चतुर्थ भाव पर त्रिपाद व पूर्ण दृष्टि तथा सप्तम भाव पर पूर्ण दृष्टि दर्शायी गई है।] टिप्पणी—जिस भाव में भी मंगल बैठा हो, उस भाव से उपर्युक्त आधार पर, उसकी खण्ड तथा पूर्ण दृष्टि के विषय में समझ लेना चाहिए।
४८ 'बुध' की विभिन्न भावों पर दृष्टि
[कुण्डली चित्र विवरण:]
- १ भाव (लग्न): बुध
- ३ भाव: एकपाद
- ४ भाव: त्रिपाद
- ५ भाव: द्विपाद
- ७ भाव: पूर्ण
- ८ भाव: त्रिपाद
- ९ भाव: द्विपाद
- १० भाव: एकपाद
**टिप्पणी—**जिस भाव में भी 'बुध' बैठा हो, उस भाव से उपर्युक्त आधार पर, उसकी खण्ड तथा पूर्ण दृष्टि के विषय में समझ लेना चाहिए।
'गुरु' की विभिन्न भावों पर दृष्टि
[कुण्डली चित्र विवरण:]
- १ भाव (लग्न): गुरु
- ३ भाव: एकपाद
- ४ भाव: त्रिपाद
- ५ भाव: द्विपाद, पूर्ण
- ७ भाव: पूर्ण
- ८ भाव: त्रिपाद
- ९ भाव: द्विपाद, पूर्ण
- १० भाव: एकपाद
**टिप्पणी—**जिस भाव में भी 'गुरु' बैठा हो, उस भाव से उपर्युक्त आधार पर उसका खण्ड तथा पूर्ण दृष्टि के विषय में समझ लेना चाहिए।
४६ 'शुक्र' की विभिन्न भावों पर दृष्टि [कुण्डली १: लग्न (१) में शुक्र] ३ भाव: एकपाद दृष्टि ४ भाव: त्रिपाद दृष्टि ५ भाव: द्विपाद दृष्टि ७ भाव: पूर्ण दृष्टि ८ भाव: त्रिपाद दृष्टि ९ भाव: द्विपाद दृष्टि १० भाव: एकपाद दृष्टि २६ टिप्पणी—जिस भाव में भी 'शुक्र' बैठा हो, उस भाव से उपर्युक्त आधार पर, उसकी खण्ड तथा पूर्ण दृष्टि के विषय में समझ लेना चाहिए। 'शनि' की विभिन्न भावों पर दृष्टि [कुण्डली २: लग्न (१) में शनि] ३ भाव: एकपाद, पूर्ण दृष्टि ४ भाव: त्रिपाद दृष्टि ५ भाव: द्विपाद दृष्टि ७ भाव: पूर्ण दृष्टि ८ भाव: त्रिपाद दृष्टि ९ भाव: द्विपाद दृष्टि १० भाव: पूर्ण, एकपाद दृष्टि २६ टिप्पणी—जिस भाव में भी 'शनि' बैठा हो, उस भाव से उपर्युक्त आधार पर, उसकी खण्ड तथा पूर्ण दृष्टि के विषय में समझ लेना चाहिए।
५० 'राहु' की विभिन्न भावों पर दृष्टि [चक्र: राहु की दृष्टि — भाव १: राहु; भाव ४: एकपाद; भाव ५: द्विपाद; भाव ६: त्रिपाद; भाव ७: पूर्ण; भाव ९: द्विपाद; भाव १०: त्रिपाद; भाव ११: एकपाद] टिप्पणी—जिस भाव में भी 'राहु' बैठा हो, उस भाव से उपर्युक्त आधार पर, उसकी खण्ड तथा पूर्ण दृष्टि के विषय में समझ लेना चाहिए। 'केतु' की विभिन्न भावों पर दृष्टि [चक्र: केतु की दृष्टि — भाव १: केतु; भाव ४: एकपाद; भाव ५: द्विपाद; भाव ६: त्रिपाद; भाव ७: पूर्ण; भाव ९: द्विपाद; भाव १०: त्रिपाद; भाव ११: एकपाद] टिप्पणी—जिस भाव में भी 'केतु' बैठा हो, उस भाव से उपर्युक्त आधार पर, उसकी खण्ड तथा पूर्ण दृष्टि के विषय में समझ लेना चाहिए। विशेष टिप्पणी—कुछ विद्वानों के मतानुसार राहु तथा केतु की खण्ड दृष्टियाँ एकपाद, द्विपाद तथा त्रिपाद होती ही नहीं हैं। प्राचीन भारतीय ज्योतिष में राहु- केतु की न तो ग्रहों के अन्तर्गत गणना की गई है और न इनके दृष्टि-सम्बन्ध का ही