भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)
Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary
महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२८६ 'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'एकादशभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश सिंह लग्न : एकादशभाव : शनि ग्यारहवें भाव में मित्र बुध की राशि पर स्थित शनि के प्रभाव से जातक की आमदनी खूब रहती है। शत्रु-पक्ष से भी विशेष लाभ होता है। कुछ परेशानियों के साथ स्त्री का सुख मिलता है तथा दैनिक व्यवसाय के क्षेत्र में भी अच्छी सफलता मिलती है। तीसरी शत्रुदृष्टि से प्रथमभाव को देखने से शारीरिक सौन्दर्य में कमी आती है तथा रोग का शिकार बनना पड़ता है। सातवीं शत्रुदृष्टि से पंचमभाव को देखने से सन्तान एवं विद्या-बुद्धि के क्षेत्र में कमी रहती है। दसवीं शत्रुदृष्टि से अष्टमभाव को देखने से पुरातत्त्व में कमी आती है तथा आयु के विषय में भी चिन्ताएं बढ़ आती हैं। 'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश सिंह लग्न : द्वादशभाव : शनि बारहवें भाव में शत्रु चन्द्रमा की राशि पर स्थित शनि के प्रभाव से जातक का खर्च अधिक होता है तथा बाहरी संबंधों से कुछ लाभ होता है। शत्रु-पक्ष से परेशानी भी मिलती है। तीसरी मित्रदृष्टि से द्वितीयभाव की देखने से धन-जन की वृद्धि के लिए विशेष परिश्रम करना पड़ता है। सातवीं दृष्टि से स्वराशि में षष्ठभाव को देखने से शत्रु-पक्ष पर प्रभाव स्थापित होता है। दसवीं नीच- दृष्टि से नवमभाव की देखने से भाग्योन्नति में कठिनाइयां आती हैं तथा धर्म की भी हानि होती है। ऐसा व्यक्ति स्त्री-पक्ष तथा व्यवसाय से कष्ट पाने वाला, अपयशी तथा रोगी होता है। 'सिंह' लग्न में 'राहु' 'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश सिंह लग्न : प्रथमभाव : राहु पहले भाव में शत्रु सूर्य की राशि पर स्थित राहु के प्रभाव के जातक के शारीरिक सौन्दर्य तथा सुख में कमी आती है तथा कभी-कभी घोर कष्टों का सामना भी करना पड़ता है। ऐसा व्यक्ति गुप्त युक्तियों तथा साहस के सहारे आगे बढ़ता है तथा भीतरी चिन्ताओं से चिन्तित भी बना रहता है।