भारतकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

DevanagariHindipublished638 पृष्ठ

पृष्ठ 278, कुल 638 में से

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२८७ 'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश सिंह लग्न : द्वितीयभाव : राहु दूसरे भाव में मित्र बुध की राशि पर स्थित राहु के प्रभाव से जातक की धन तथा कुटुम्ब के सुख में कुछ कठिनाइयों के साथ सफलता मिलती है। कभी-कभी उसे घोर आर्थिक कष्ट भी उठाना पड़ता है तथा ऋण- ग्रस्त भी होना पड़ता है तो कभी आकस्मिक धन का लाभ भी होता रहता है। ऐसा व्यक्ति चतुर तथा चालाक होता है तथा धन-वृद्धि के लिए कठिन परिश्रम करता है। 'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश सिंह लग्न : तृतीयभाव : राहु तीसरे भाव में मित्र शुक्र की राशि पर स्थित राहु के प्रभाव से जातक के पराक्रम की विशेष वृद्धि होती है तथा भाई-बहिन की ओर से कुछ कष्ट प्राप्त होता है। ऐसा व्यक्ति बड़ा साहसी, धैर्यवान् तथा परिश्रमी होता है। वह गुप्त युक्तियों द्वारा गंभीरतापूर्वक अपनी स्वार्थ-सिद्धि करता है तथा दृढ़ निश्चयी होता है। 'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'चतुर्थभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश सिंह लग्न : चतुर्थभाव : राहु चौथे भाव में शत्रु मंगल की राशि पर स्थित राहु के प्रभाव से जातक की मातृ पक्ष से कष्ट मिलता है तथा भूमि, भवन आदि के सुख में बाधा उत्पन्न होती है। उसे परदेश में जाकर रहना पड़ता है। परन्तु वह हिम्मत, गुप्त युक्ति एवं धीरज के साथ सुख के साधनों को जुटाता तथा संकटों का सामना करता है।

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