भारतकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

DevanagariHindipublished638 पृष्ठ

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३०० 'कन्या' लग्न में 'केतु' का फलादेश १—'कन्या' लग्न वालों को अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'केतु' का स्थायी फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या ७५७ से ७६८ के बीच देखना चाहिए। २—'कन्या' लग्न वालों को गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'केतु' का अस्थायी फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए— जिस वर्ष में 'केतु'— (क) 'मेष' राशि पर हो तो संख्या ७५७ (ख) 'वृष' राशि पर हो तो संख्या ७५८ (ग) 'मिथुन' राशि पर हो तो संख्या ७५६ (घ) 'कर्क' राशि पर हो तो संख्या ७६० (ङ) 'सिंह' राशि पर हो तो संख्या ७६१ (च) 'कन्या' राशि पर हो तो संख्या ७६२ (छ) 'तुला' राशि पर हो तो संख्या ७६३ (ज) 'वृश्चिक' राशि पर हो तो संख्या ७६४ (झ) 'धनु' राशि पर हो तो संख्या ७६५ (ञ) 'मकर' राशि पर हो तो संख्या ७६६ (ट) 'कुम्भ' राशि पर हो तो संख्या ७६७ (ठ) 'मीन' राशि पर हो तो संख्या ७६८ 'कन्या' लग्न में 'सूर्य' 'कन्या' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश कन्या लग्न : प्रथमभाव : सूर्य पहले भाव में जिस बुध की राशि पर स्थित सूर्य के प्रभाव से जातक दुर्बल शरीर वाला, खूब खर्च करने वाला तथा बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से लाभ प्राप्त करने वाला होता है। परन्तु कभी-कभी खर्च के कारण उसे परेशानी उठानी पड़ती है। सातवीं मित्रदृष्टि से सप्तमभाव को देखने से स्त्री तथा व्यवसाय के पक्ष में कुछ हानि का सामना भी करना पड़ता है तथा असन्तोष भी बना रहता है।


कुण्डली विवरण (संख्या ६६१):

  • लग्न (प्रथम भाव): ६ (कन्या), सूर्य
  • द्वितीय भाव: ७ (तुला)
  • तृतीय भाव: ८ (वृश्चिक)
  • चतुर्थ भाव: ९ (धनु)
  • पंचम भाव: १० (मकर)
  • षष्ठ भाव: ११ (कुम्भ)
  • सप्तम भाव: १२ (मीन)
  • अष्टम भाव: १ (मेष)
  • नवम भाव: २ (वृष)
  • दशम भाव: ३ (मिथुन)
  • एकादश भाव: ४ (कर्क)
  • द्वादश भाव: ५ (सिंह)