भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)
Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary
महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३०१ 'कन्या' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश कन्या लग्न : द्वितीयभाव : सूर्य दूसरे भाव में शत्रु 'शुक्र' की राशि पर स्थित नीच के सूर्य के प्रभाव से जातक की धन तथा कुटुम्ब की हानि होती है। बाहरी स्थानों से आर्थिक लाभ कम होता है, तथा खर्च के कारण परेशानी भी होती है। सातवीं दृष्टि से अष्टमभाव को देखने के कारण जातक की पुरातत्त्व तथा आयु का लाभ प्राप्त ६६२ होता है। 'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'तृतीयभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश कन्या लग्न : तृतीयभाव : सूर्य तीसरे भाव में मित्र 'मंगल' की राशि पर स्थित 'सूर्य' के प्रभाव से जातक के पराक्रम में वृद्धि होती है, परन्तु भाई-बहिन के सुख में कुछ न्यूनता आती है। ऐसा व्यक्ति अपने पुरुषार्थ द्वारा जीवन में सफलताएँ प्राप्त करता है तथा अत्यन्त हिम्मती और प्रभावशाली होता है। सातवीं शत्रुदृष्टि से नवम भाव को देखने से भाग्य तथा धर्म के क्षेत्र में कुछ कमी रहती है। ऐसे व्यक्ति का जीवन सामान्य ढंग से व्यतीत होता है। ६६३ 'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'चतुर्थभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश कन्या लग्न : चतुर्थभाव : सूर्य चौथे भाव में मित्र 'गुरु' की राशि पर स्थित 'सूर्य' के प्रभाव से जातक की माता, भूमि तथा भवन के सुख में कमी रहती है। उसे बाहरी स्थानों से सुख तथा खर्च के लिए धन प्राप्त होता है। सातवीं मित्रदृष्टि से दशम भाव को देखने के कारण पिता, राज्य एवं व्यवसाय-पक्ष से भी कुछ असन्तोष रहता है। ६६४