भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)
Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary
महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३०२ 'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'पंचमभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश कन्या लग्न : पंचमभाव : सूर्य पाँचवें भाव में शत्रु शनि की राशि पर स्थित 'सूर्य' के प्रभाव से जातक की विद्या, बुद्धि तथा सन्तान में कमी रहती है तथा खर्च चलाने के लिए दिमाग में परेशानी रहती है। सातवीं मित्रदृष्टि से एकादश भाव को देखने के कारण सामान्य लाभ होता रहता है। ऐसा व्यक्ति चक्करदार बातें करने वाला तथा चंचल होता है। ६६४ 'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'षष्ठभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश कन्या लग्न : षष्ठभाव : सूर्य छठे भाव में शत्रु 'शनि' की राशि पर स्थित 'सूर्य' के प्रभाव से जातक शत्रुओं से परेशान रहता है तथा अधिक खर्च करके ही उन पर प्रभाव स्थापित कर पाता है। वह परिश्रम द्वारा अपना खर्च चलाता है तथा बाहरी सम्बन्धों से सामान्य लाभ होता है। सातवीं दृष्टि से स्वराशि वाले द्वादशभाव को देखने के कारण खर्च अधिक बना रहता है। ६६५ 'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'सप्तमभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश कन्या लग्न : सप्तमभाव : सूर्य सातवें भाव में मित्र 'गुरु' की राशि पर स्थित सूर्य के प्रभाव से जातक की स्त्री तथा व्यवसाय-पक्ष में कुछ हानि उठानी पड़ती है। बाहरी स्थानों से लाभ के अतिरिक्त हानि भी होती है। सातवीं मित्रदृष्टि से प्रथमभाव को देखने के जातक का शरीर दुर्बल होता है तथा वह स्वभाव से चंचल, क्रोधी एवं धन की ओर से चिन्तित बना रहने वाला होता है। ६६६