भारतकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

DevanagariHindipublished638 पृष्ठ

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३०३ 'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'अष्टमभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश कन्या लग्न : अष्टमभाव : सूर्य आठवें भाव में मित्र 'मंगल' की राशि पर स्थित उच्च 'सूर्य' के प्रभाव से जातक की आयु एवं पुरातत्त्व में कुछ कठिनाइयों के साथ वृद्धि होती है। खर्च की अधिकता एवं बाहरी संबंधों से लाभ होता है। सातवीं नीचदृष्टि से द्वितीयभाव को देखने से धन की हानि होती है एवं कौटुम्बिक सुख में कमी आती है। ऐसी गृह-स्थिति का जातक धन के विषय में बहुत चिन्तित बना रहता है। ६६८ 'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'नवमभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश कन्या लग्न : नवमभाव : सूर्य नवें भाव में शत्रु 'शुक्र' की राशि पर स्थित 'सूर्य' के प्रभाव से जातक के भाग्य तथा धर्म के क्षेत्र में कमी रहती है। ऐसे लोग प्रायः नास्तिक होते हैं। उन्हें बाहरी सम्बन्धों से लाभ होता है। सातवीं मित्रदृष्टि से तृतीयभाव को देखने से भाई-बहिन के सुख में कमी रहती है तथा पराक्रम की भी अधिक वृद्धि नहीं होती। ६६९ 'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'दशमभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश कन्या लग्न : दशमभाव : सूर्य दसवें भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित 'सूर्य' के प्रभाव से जातक की राज्य, पिता तथा व्यवसाय के क्षेत्र में कठिनाइयाँ आती हैं। खर्च अधिक रहता है तथा बाहरी स्थानों से लाभ होता है। सातवीं मित्र-दृष्टि से चतुर्थभाव को देखने से माता, भूमि तथा भवन के सुख में भी कुछ कमी बनी रहती है। ६७०