भारतकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

DevanagariHindipublished638 पृष्ठ

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३०४ 'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'एकादशभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश कन्या लग्न : एकादशभाव : सूर्य ग्यारहवें भाव में मित्र 'चन्द्रमा' की राशि पर स्थित 'सूर्य' के प्रभाव से जातक की पर्याप्त आमदनी होते हुए भी खर्च चलाने की चिन्ता बनी रहती है तथा बाहरी स्थानों से सम्बन्ध से लाभ, सुख तथा सम्मान मिलता है। सातवीं शत्रु दृष्टि से पंचमभाव को देखने से सन्तान तथा विद्या-बुद्धि का क्षेत्र भी कमजोर रहता है। 'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'द्वादशभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश कन्या लग्न : द्वादशभाव : सूर्य बारहवें भाव में स्वराशि-स्थित सूर्य के प्रभाव जातक का खर्च अधिक रहता है, परन्तु बाहरी स्थानों से लाभ एवं सम्मान भी मिलता है। सातवीं शत्रुदृष्टि से षष्ठभाव को देखने के कारण शत्रुपक्ष एवं रोग आदि से काफी परेशानी होती है तथा खर्च भी अधिक होता है। फिर भी जातक अपना साहस बनाये रख कर शत्रु-पक्ष पर प्रभाव स्थापित कर लेता है। 'कन्या' लग्न में 'चन्द्रमा' 'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'प्रथमभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश कन्या लग्न : प्रथमभाव : चन्द्र पहले भाव में मित्र बुध की राशि पर स्थित चन्द्रमा के प्रभाव से जातक की शारीरिक सौन्दर्य, प्रसन्नता एवं मनोबल का लाभ होता है। वह परिश्रम द्वारा धन तथा यश कमाता है और प्रभावशाली बनता है। सातवीं मित्रदृष्टि से सप्तमभाव को देखने से सुन्दरी स्त्री मिलती है तथा स्त्री-पक्ष एवं व्यवसाय से यथेष्ट लाभ होता है।