भारतकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

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३२८ 'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'द्वादशभाव' में स्थित 'शनि' का फलादेश कन्या लग्न : द्वादशभाव : शनि बारहवें भाव में शत्रु 'सूर्य' की राशि पर स्थित 'शनि' के प्रभाव से जातक का खर्च अधिक रहता है तथा बाहरी सम्बन्धों से परेशानी रहती है। तीसरी उच्च-दृष्टि से द्वितीयभाव को देखने से धन तथा कुटुम्ब की वृद्धि विशेष प्रयत्न करने से होती है। सातवीं दृष्टि से स्वराशि में षष्ठभाव को देखने से शत्रु-पक्ष पर प्रभाव रहता है, परन्तु रोगादि से कुछ कष्ट होता है। दसवीं मित्र-दृष्टि से नवमभाव को देखने से बुद्धि-योग द्वारा भाग्य की उन्नति होती है तथा धर्म में रुचि भी रहती है। ऐसा व्यक्ति शान-शौकत में खूब खर्च करता है। 'कन्या' लग्न में 'राहु' 'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'प्रथमभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश कन्या लग्न : प्रथमभाव : राहु पहले भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित 'राहु' के प्रभाव से जातक शारीरिक दृष्टि से शक्ति- शाली, दृढ़ मनोबल वाला तथा स्वाभिमानी होता है, परन्तु कभी-कभी उसे शारीरिक कष्ट भी उठाने पड़ते हैं। वह गहरी सूझ-बूझ वाला तथा कठोर परिश्रमी होता है। मानसिक रूप से चिन्तित रहते हुए भी बड़े धैर्य से काम लेकर उन्नति करता है। 'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'द्वितीयभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश कन्या लग्न : द्वितीयभाव : राहु दूसरे भाव में मित्र 'शुक्र' की राशि पर स्थित 'राहु' के प्रभाव से जातक धन-कुटुम्ब की ओर से परे- शान रहता है। वह गुप्त प्रयत्न तथा कठिन परिश्रम द्वारा कुछ धन-संचय भी करता है तथा सकट रूप में धनवान् भी समझा जाता है। कभी-कभी उसे आकस्मिक लाभ तथा हानि—दोनों ही होते हैं।