भारतकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

DevanagariHindipublished638 पृष्ठ

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३२६ 'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'तृतीयभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश कन्यालग्न : तृतीयभाव : राहु तीसरे भाव में शत्रु 'मंगल' की राशि पर स्थित 'राहु' के प्रभाव से जातक के पराक्रम में वृद्धि होती है, परन्तु भाई-बहिनों से परेशानी मिलती है। ऐसा व्यक्ति गुप्त युक्तियों एवं हिम्मत के बल पर सफलता प्राप्त करता है तथा स्वार्थ-सिद्धि के लिए भले-बुरे का विचार नहीं करता। 'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'चतुर्थभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश कन्या लग्न : चतुर्थभाव : राहु चौथे भाव में शत्रु 'गुरु' की राशि पर स्थित 'राहु' के प्रभाव से जातक को माता का अच्छा सुख मिलता है, परन्तु भूमि, भवन एवं घरेलू सुख में कमी रहती है। घरेलू कारणों से कभी-कभी घोर संकटों का सामना भी करना पड़ता है। परदेश में रहने का योग भी उपस्थित होता है। जन्म-भूमि में उसे दुःख मिलता है, परन्तु बाहरी स्थान में सुख प्राप्त होता है। 'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'पंचमभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश कन्या लग्न : पंचमभाव : राहु पाँचवें भाव में मित्र 'शनि' की राशि पर स्थित 'राहु' के प्रभाव से जातक की सन्तान-पक्ष से कष्ट मिलता है तथा विद्या के क्षेत्र में कठिनाइयां आती हैं। ऐसा व्यक्ति विद्वान् न होने पर भी बातें करने में बड़ा चतुर होता है तथा अपने स्वार्थ को सिद्ध करने के लिए सत्यासत्य का विचार भी नहीं करता। कभी- कभी उसे चिन्ताएं भी परेशान करती रहती हैं।