भारतकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

DevanagariHindipublished638 पृष्ठ

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३३० 'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'षष्ठभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश कन्यालग्न : षष्ठभाव : राहु छठे भाव में मित्र 'शनि' की राशि पर स्थित 'राहु' के प्रभाव से जातक शत्रु-पक्ष पर प्रभावशाली रहता है तथा झगड़ों एवं संकटों के समय हिम्मत तथा धैर्य से काम लेकर, अपनी कमजोरी को प्रकट नहीं होने देता। वह कठिन संकटों के समय भी विचलित नहीं होता और उन पर अपनी गुप्त युक्तियों द्वारा नियन्त्रण पा लेता है। 'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'सप्तमभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश कन्या लग्न : सप्तमभाव : राहु सातवें भाव में शत्रु 'गुरु' की राशि पर स्थित 'राहु' के प्रभाव से जातक की स्त्री-पक्ष से कष्ट मिलता है तथा व्यवसाय के क्षेत्र में भी कठिनाइयाँ आती हैं। उसको मूतेन्द्रिय में विकार भी हो सकता है। ऐसा व्यक्ति गुप्त युक्तियों तथा कठिन परिश्रम के बल पर ही अपना काम चलाता रहता है। 'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'अष्टमभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश कन्यालग्न : अष्टमभाव : राहु आठवें भाव में शत्रु 'मंगल' की राशि पर स्थित 'राहु' के प्रभाव से जातक को जीवन में अनेक बार खतरों का सामना करना पड़ता है तथा मृत्यु- तुल्य कष्ट भी भोगने पड़ते हैं। उसके पेट में भी विकार रहता है। गुप्त युक्तियों, धैर्य तथा साहस के बल पर वह आगे बढ़ता है। उसे चिन्ताएँ तथा परेशानियाँ हमेशा घेरे रहती हैं। 'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'नवमभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश कन्यालग्न : नवमभाव : राहु नवें भाव में मित्र 'शुक्र' की राशि पर स्थित 'राहु' के प्रभाव से जातक अपनी भाग्योन्नति के लिए कठोर परिश्रम करता है तथा धर्म का उचित पालन नहीं कर पाता। कभी-कभी उसे भाग्य के विषय में घोर संकटों का सामना भी करना पड़ता है। ऐसा व्यक्ति अपनी गुप्त युक्तियों, धैर्य तथा साहस के बल पर ही थोड़ी बहुत उन्नति कर पाता है।