भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)
Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary
महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३३२ 'कन्या' लग्न में 'केतु' 'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'प्रथमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश कन्या लग्न : प्रथमभाव : केतु पहले भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक को शारीरिक कष्ट एवं चिन्ताओं का सामना करना पड़ता है। शरीर पर कोई गहरी चोट लगने अथवा रोग होने का योग भी बनता है। शारीरिक सौन्दर्य में कमी रहती है। ऐसा व्यक्ति गुप्त युक्तियों वाला, हिम्मती, धैर्यवान् तथा अख्खड़ स्वभाव का होता है। 'कन्या' लग्न की कुंडली में 'द्वितीयभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश कन्या लग्न : द्वितीयभाव : केतु दूसरे भाव में मित्र 'शुक्र' की राशि पर स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक के धन तथा कौटुम्बिक सुख में कमी आती है। कभी-कभी आकस्मिक धन-हानि भी होती है तो कभी-कभी आकस्मिक रूप से धन-लाभ भी हो जाता है। ऐसा व्यक्ति धन की वृद्धि के लिए अथक परिश्रम करता है, तथा हर समय परेशान बना रहता है। 'कन्या' लग्न की कुंडली में 'तृतीयभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश कन्या लग्न : तृतीयभाव : केतु तीसरे भाव में शत्रु 'मंगल' की राशि पर स्थित केतु के प्रभाव से जातक के पराक्रम की अत्यधिक वृद्धि होती है, परन्तु भाई-बहिनों से परेशानी मिलती है। ऐसा व्यक्ति संकट के समय भी हिम्मत नहीं हारता तथा अपने ही बाहु-बल का भरोसा रखता है। वह कठिन परिश्रमी भी होता है।