भारतकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

DevanagariHindipublished638 पृष्ठ

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३३३ 'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'चतुर्थभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश कन्या लग्न : चतुर्थभाव : केतु चौथे भाव में शत्रु 'गुरु' की राशि पर स्थित उच्च के केतु के प्रभाव से जातक को माता, भूमि तथा भवन का सुख प्राप्त होता है। घरेलू जीवन ठाठदार होता है। इसके लिए उसे विशेष परिश्रम भी करना पड़ता है। कभी-कभी घरेलू सुख में संकट भी आता है और कभी सुख में वृद्धि भी हो जाती है। 'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'पंचमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश कन्या लग्न : पंचमभाव : केतु पांचवें भाव में मित्र 'शनि' की राशि पर स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक की सन्तान-पक्ष से चिन्ता रहती है तथा विद्या-प्राप्ति के लिए कठिन परिश्रम करना पड़ता है। ऐसा व्यक्ति अपनी विद्या-बुद्धि में कमी को स्वयं अनुभव करता है, परन्तु फिर भी स्वयं को बड़ा समझदार तथा योग्य प्रदर्शित करता है। वह बातचीत में बड़ा तेज होता है। 'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'षष्ठभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश कन्या लग्न : षष्ठभाव : केतु छठे भाव में मित्र 'शनि' की राशि पर स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक शत्रु-पक्ष पर अपना विशेष प्रभाव रखता है। उसे ननसाल-पक्ष से परेशानी उठानी पड़ती है। ऐसा व्यक्ति बड़ा धैर्यवान्, गुप्त युक्तियों वाला, बहादुर, निर्भय तथा अक्खड़ स्वभाव का होता है और इन्हीं विशेषताओं के कारण अपना काम बना लेने में सफलता भी प्राप्त करता है।