भारतकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

DevanagariHindipublished638 पृष्ठ

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३३४ 'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'सप्तमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश कन्यालग्न : सप्तमभाव : केतु सातवें भाव में शत्रु 'गुरु' की राशि पर स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक की स्त्री-पक्ष से कष्ट मिलता है तथा व्यवसाय के क्षेत्र में भी बड़ी कठि- नाइयाँ आती हैं, परन्तु वह अपनी गुप्त युक्ति, धैर्य- तथा साहस के बल पर उनके निराकरण का प्रयत्न करता है। उसका गृहस्थ-जीवन बड़ी कठिनाइयों से सफल बनता है। उसकी मूलेन्द्रिय में विकार होने की संभावना भी रहती है। 'कन्या' लग्न की कुंडली में 'अष्टमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश कन्यालग्न : अष्टमभाव : केतु आठवें भाव में शत्रु 'मंगल' की राशि पर स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक के जीवन में अनेक बार प्राणान्तक कष्ट उपस्थित होता है तथा पुरातत्त्व की हानि भी होती है। उसके पेट में भी विकार रहता है। ऐसा व्यक्ति बड़ा परिश्रमी, क्रोधी, धैर्यवान्, हिम्मत तथा तेजी से काम करने वाला होता है। 'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'नवमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश कन्यालग्न : नवमभाव : केतु नवें भाव में मित्र 'शुक्र' की राशि पर स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक की धर्म-क्षेत्र में कमी रहती है तथा भाग्योन्नति में भी बड़े संकट आते हैं। ऐसा व्यक्ति अपने चातुर्य, गुप्त युक्तियों, बुद्धि तथा साहस के बल पर संकटों से अपनी रक्षा करता है तथा कभी-कभी विशेष चिन्तनीय स्थितियों में होकर भी गुजरता है।