भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)
Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary
महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा
पृष्ठ 326, कुल 638 में से
संदर्भ में पढ़ें३३५ 'कन्या' लग्न की कुंडली में 'दशमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश कन्या लग्न : दशमभाव : केतु दसवें भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक को पिता के क्षेत्र में हानि उठानी पड़ती है तथा राज्य एवं व्यवसाय के क्षेत्र में अधिक प्रभाव स्थापित नहीं होता। उसे भाव-हानि, धन-हानि आदि का शिकार बनना पड़ता है। वह झगड़े-झंझट तथा परेशानियों में अक्सर फंसता रहता है। 'कन्या' लग्न की कुंडली में 'एकादशभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश कन्या लग्न : एकादशभाव : केतु ग्यारहवें भाव में शत्रु 'चन्द्रमा' की राशि पर स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक की आमदनी के साधनों में वृद्धि होती है, परन्तु उसे मानसिक- परेशानियों भी बहुत रहती हैं। कभी-कभी उसे संकट एवं हानि का सामना करना पड़ता है तो कभी-कभी आकस्मिक लाभ भी होता है। ऐसा व्यक्ति बड़ा धैर्यवान् तथा परिश्रमी होता है। 'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'द्वादशभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश कन्या लग्न : द्वादशभाव : केतु बारहवें भाव में शत्रु 'सूर्य' की राशि पर स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक को खर्चे के कारण अनेक चिन्ताओं तथा परेशानियों का सामना करना पड़ता है। बाहरी स्थानों के सम्बन्ध भी कष्टकारक सिद्ध होते हैं। वह कभी-कभी संकटों का शिकार भी बनता है, परन्तु अपने धैर्य एवं गुप्त युक्तियों के बल पर जैसे-तैसे छुटकारा भी पा लेता है।