भारतकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

DevanagariHindipublished638 पृष्ठ

पृष्ठ 364, कुल 638 में से

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पृष्ठ 364

३७२ 'तुला' लग्न की कुण्डली के 'नवमभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश तुला लग्न : नवमभाव : राहु नवें भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित 'राहु' के प्रभाव से जातक गुप्त युक्तियों के बल पर अपने भाग्य की विशेष उन्नति करता है तथा धर्म का पालन भी करता है। उसकी भाग्योन्नति में कभी-कभी बाधाएँ आती हैं, परन्तु वह अपने चातुर्य, धैर्य एवं गुप्त युक्तियों के बल पर उन सब पर विजय पा लेता है। 'तुला' लग्न की कुण्डली के 'दशमभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश तुला लग्न : दशमभाव : राहु दसवें भाव में शत्रु 'चन्द्रमा' की राशि पर स्थित 'राहु' के प्रभाव से जातक को पिता के सुख में कमी रहती है। राज्य के क्षेत्र में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है तथा व्यवसाय के क्षेत्र में भी संकट आते हैं। उन्नति के मार्ग में आने वाली सभी बाधाओं को पार करने के बाद ही उसे सफलता मिलती है। 'तुला' लग्न की कुण्डली के 'एकादशभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश तुला लग्न : एकादशभाव : राहु ग्यारहवें भाव में शत्रु 'सूर्य' की राशि पर स्थित राहु के प्रभाव से जातक की आमदनी के मार्ग में कठिनाइयाँ आती हैं, जिन पर वह गुप्त युक्तियों, चतुराई, धैर्य एवं हिम्मत के बल पर विजय पाता है तथा उन्नति करता है। कभी-कभी उसे विशेष संकटों का सामना भी करना पड़ता है।

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