भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)
Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary
महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३७४ 'तुला' लग्न की कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश तुलालग्न : द्वादशभाव : राहु बारहवें भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित 'राहु' के प्रभाव से जातक का खर्च अधिक रहता है तथा कभी-कभी बड़े संकटों का शिकार भी बनना पड़ता है। उसे बाहरी स्थानों के सम्बन्ध में कुछ लाभ भी मिल जाता है। ऐसा व्यक्ति बड़ा विवेकी, कूट- नीतिज्ञ, परिश्रमी, धैर्यवान् तथा हिम्मती होता है। 'तुला' लग्न में 'केतु' 'तुला' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश तुलालग्न : प्रथमभाव : केतु पहले भाव में मित्र 'शुक्र' की राशि पर स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक को कभी-कभी विशेष शारीरिक संकटों का सामना करना पड़ता है, परन्तु वह अपने गुप्त चातुर्य तथा साहस के बल पर उन पर विजय पाता है और भीतर से गुप्त कमजोरी रहते हुए भी ऊपर से बड़ा हिम्मती दिखाई देता है। 'तुला' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश तुलालग्न : द्वितीयभाव : केतु दूसरे भाव में शत्रु 'मंगल' की राशि पर स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक को धन-प्राप्ति एवं धन- संचय के मार्ग में बड़े संकट आते हैं। वह गुप्त युक्तियों के बल पर ही धनोपार्जन करता है, परन्तु हमेशा चिंतित तथा परेशान ही बना रहता है। उसे अपने कुटुम्बियों द्वारा भी कष्ट मिलता है। फिर भी वह बड़ा हिम्मती तथा धैर्य वाला होता है।