भारतकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

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३७५ 'तुला' लग्न की कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश तुलालग्न : तृतीयभाव : केतु तीसरे भाव में शत्रु 'गुरु' की राशि पर स्थित उच्च के 'केतु' के प्रभाव से जातक के पराक्रम में अत्यधिक वृद्धि होती है तथा भाई-बहिनों का सुख भी खूब मिलता है। कभी-कभी भाई-बहिनों के कारण उसे कष्ट भी उठाना पड़ता है। ऐसा व्यक्ति बड़ा हिम्मती, परिश्रमी तथा धैर्य- वान् होता है। 'तुला' लग्न की कुण्डली के 'चतुर्थभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश तुलालग्न : चतुर्थभाव : केतु चौथे भाव में मित्र 'शनि' की राशि पर स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक की माता, भूमि तथा भवन के सुख में कमी रहती है। घरेलू झगड़े भी बहुत रहते हैं, फिर भी वह अपने धैर्य, साहस तथा गुप्त युक्तियों के बल से कठिनाइयों पर विजय पाने का प्रयत्न करता है और कुछ सफलता भी पा लेता है। 'तुला' लग्न की कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश तुलालग्न : पंचमभाव : केतु पाँचवें भाव में मित्र 'शनि' की राशि पर स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक की संतान-पक्ष से कष्ट मिलता है तथा विद्या-बुद्धि के क्षेत्र में भी कठिनाइयां आती हैं। ऐसा व्यक्ति अनेक कठिनाइयों के बाद विद्या, बुद्धि तथा सन्तान के क्षेत्र में थोड़ी-बहुत सफलता पाता है, फिर भी उसके संकट बने ही रहते हैं।