भारतकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

DevanagariHindipublished638 पृष्ठ

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३७६ 'तुला' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश तुला लग्न : षष्ठभाव : केतु छठे भाव में शत्रु 'गुरु' की राशि पर स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक झगड़े-झंझट, रोग तथा शत्रु-पक्ष में बड़ी हिम्मत, बहादुरी तथा धैर्य से काम लेकर सफलता प्राप्त करता है और कभी डरता या घबराता नहीं है। उसे अपने उद्देश्य में सफलता भी मिलती है। ऐसे व्यक्ति का ननसाल-पक्ष प्रायः कमजोर रहता है। 'तुला' लग्न की कुण्डली के 'सप्तमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश तुला लग्न : सप्तमभाव : केतु सातवें भाव में शत्रु 'मंगल' की राशि पर स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक को स्त्री-पक्ष से विशेष कष्ट मिलता है तथा दैनिक आमदनी में भी बड़ी कठिनाइयाँ आती हैं। वह स्त्री तथा व्यवसाय-पक्ष में सफलता पाने के लिए धैर्य, हिम्मत, पराक्रम तथा गुप्त युक्तियों का सहारा लेता है और थोड़ी-बहुत सफलता भी प्राप्त करता है। 'तुला' लग्न की कुण्डली के 'अष्टमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश तुला लग्न : अष्टमभाव : केतु आठवें भाव में मित्र 'शुक्र' की राशि पर स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक की आयु पर अनेक बार संकट आते हैं तथा उसे पुरातत्त्व की भी हानि उठानी पड़ती है। पेट में कुछ विकार भी रहता है। ऐसा व्यक्ति सदैव चिन्तातुर रहता है तथा अपने साहस, धैर्य एवं गुप्त युक्तियों के बल पर कुछ सफलता भी प्राप्त कर लेता है।