भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)
Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary
महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३७७ 'तुला' लग्न की कुण्डली के 'नवमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश तुला लग्न : नवमभाव : केतु नवें भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक की भाग्योन्नति में अनेक बाधाएँ आती हैं तथा कभी-कभी घोर संकटों का सामना भी करना पड़ता है। ईश्वर तथा धर्म के विषय में भी उनकी श्रद्धा कम होती है। वह धर्म के विरुद्ध चलने में भी नहीं चूकता तथा स्वार्थ-सिद्धि के लिए अनुचित साधनों का प्रयोग कर अपयश भी पाता है। ८७४ 'तुला' लग्न की कुण्डली के 'दशमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश तुला लग्न : दशमभाव : केतु दसवें भाव में शत्रु 'चन्द्रमा' की राशि पर स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक को अपने पिता द्वारा कष्ट प्राप्त होता है तथा राज्य-पक्ष से भी परेशानी होती है। व्यवसाय में उसे विघ्न-बाधाओं का सामना करना पड़ता है। उसे अपने जीवन में प्रायः अनेक उतार-चढ़ाव देखने पड़ते हैं। ८७५ 'तुला' लग्न की कुण्डली के 'एकादशभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश तुला लग्न : एकादशभाव : केतु ग्यारहवें भाव में शत्रु 'सूर्य' की राशि पर स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक को आमदनी के क्षेत्र में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है परन्तु वह अपने धैर्य, परिश्रम तथा गुप्त युक्तियों के बल पर उन्हें दूर करके सफलता प्राप्त करता है। कभी-कभी उसे लाभ के बजाय बहुत घाटा भी उठाना पड़ता है। अनेक संकटों को पार करने के बाद ही उसे सफलता मिलती है। 'तुला' लग्न की कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश तुला लग्न : द्वादशभाव : केतु बारहवें भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक का खर्च अधिक रहता है तथा बाहरी स्थानों के संबंध से उसे लाभ भी प्राप्त होता है। ऐसा व्यक्ति अपना खर्च चलाने के लिए विवेक-बुद्धि से काम लेता तथा कठिन परिश्रम करता है, फिर भी उसे कभी-कभी बड़ी कठिनाइयों का शिकार बनना पड़ता है तथा अन्त में सफलता भी प्राप्त हो जाती है। ८७७