भारतकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

DevanagariHindipublished638 पृष्ठ

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३७६ 'वृश्चिक' लग्न में जन्म लेने वाला जातक अपनी प्रारंभिक अवस्था में दुःखी रहता है तथा मध्यमावस्था में सुख भोगता है । २० से २४ वर्ष की आयु के बीच उसका भाग्योदय होता है । वृश्चिक लग्न वालों को अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित विभिन्न ग्रहों का स्थायी फलादेश आगे दी गई उदाहरण-कुण्डली संख्या ८७६ के ९८६ के बीच देखना चाहिए । गोचर-कुण्डली के ग्रहों का फलादेश किन उदाहरण-कुण्डलियों में देखें—इसे आगे लिखे अनुसार समझ लेना चाहिए । 'वृश्चिक' लग्न में 'सूर्य' का फलादेश १. 'वृश्चिक' लग्न वालों को अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'सूर्य' का स्थायी फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या ८७६ से ८६० के बीच देखना चाहिए । २. 'वृश्चिक' लग्न वालों को गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'सूर्य' का अस्थायी फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए— जिस महीने में 'सूर्य'— (क) 'मेष' राशि पर हो तो संख्या ८७६ (ख) 'वृष' राशि पर हो तो संख्या ८८० (ग) 'मिथुन' राशि पर हो तो संख्या ८८१ (घ) 'कर्क' राशि पर हो तो संख्या ८८२ (ङ) 'सिंह' राशि पर हो तो संख्या ८८३ (च) 'कन्या' राशि पर हो तो संख्या ८८४ (छ) 'तुला' राशि पर हो तो संख्या ८८५ (ज) 'वृश्चिक' राशि पर हो तो संख्या ८८६ (झ) 'धनु' राशि पर हो तो संख्या ८८७ (ञ) 'मकर' राशि पर हो तो संख्या ८८८ (ट) 'कुम्भ' राशि पर हो तो संख्या ८८९ (ठ) 'मीन' राशि पर हो तो संख्या ८६०