भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)
Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary
महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४१० 'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश वृश्चिकलग्न : पंचमभाव : शनि पाँचवें भाव में भ्रातृ 'गुरु' की राशि पर स्थित 'शनि' के प्रभाव से जातक को सन्तान-सुख तो मिलता है, परन्तु सन्तान से मतभेद भी रहता है। विद्या-बुद्धि पर्याप्त रहती है। माता से वैमनस्य रहता है तथा भूमि-भवन का सामान्य सुख प्राप्त होता है। तीसरी मित्र-दृष्टि से सप्तमभाव को देखने से स्त्री तथा व्यवसाय के क्षेत्र में पूर्ण सुख एवं सफ- लता की प्राप्ति होती है। सातवीं मित्र-दृष्टि से एकादशभाव की देखने से आमदनी अच्छी रहती है। दसवीं शत्रु-दृष्टि से द्वितीयभाव को देखने से कुटुम्ब से वैमनस्य रहता है तथा अधिक प्रयत्न करने पर भी धन का विशेष संचय नहीं हो पाता। 'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश वृश्चिकलग्न : षष्ठभाव : शनि छठे भाव में शत्रु 'मंगल' की राशि पर स्थित 'शनि' के प्रभाव से जातक शत्रु-पक्ष में युक्ति से काम निकालता है। माता, भूमि तथा भवन का सुख भी अल्प मात्रा में प्राप्त होता है। तीसरी मित्र दृष्टि से अष्टमभाव की देखने से आयु तथा पुरातत्त्व का लाभ होता है। सातवीं उच्च दृष्टि से द्वादशभाव को देखने से खर्च अधिक रहता है तथा बाहरी स्थानों के संबंध से लाभ होता है। दसवीं दृष्टि से स्वराशि में तृतीयभाव की देखने से पराक्रम की वृद्धि होती है तथा विरोध रहते हुए भी भाई-बहिनों का सुख मिलता है। 'वृश्चिक' लग्न की कुण्डली के 'सप्तमभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश वृश्चिकलग्न : सप्तमभाव : शनि सातवें भाव में मित्र 'शुक्र' की राशि पर स्थित 'शनि' के प्रभाव से जातक की स्त्री तथा दैनिक व्यवसाय के क्षेत्र में सुख एवं सफलता की प्राप्ति होती है। तीसरी शत्रु-दृष्टि से नवमभाव को देखने से कुछ कठिनाइयों के साथ भाग्य तथा धर्म की उन्नति होती है। सातवीं शत्रु-दृष्टि से प्रथमभाव को देखने से शारीरिक सौन्दर्य में कमी रहती है तथा श्रम अधिक करना पड़ता है। दसवीं दृष्टि से स्वराशि में चतुर्थभाव की देखने से माता, भूमि एवं भवन का यथेष्ट सुख प्राप्त होता है। दैनिक जीवन प्रभावशाली तथा आमोदपूर्ण रहता है।