भारतकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

DevanagariHindipublished638 पृष्ठ

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५०० ‘मकर’ लग्न की कुण्डली के ‘नवमभाव’ स्थित ‘राहु’ का फलादेश मकरलग्न : नवमभाव : राहु नवें भाव में मित्र ‘बुध’ की राशि पर स्थित राहु के प्रभाव से जातक की भाग्योन्नति में निरन्तर बाधाएँ आती रहती हैं। कभी-कभी विशेष कठिनाइयों का शिकार भी बनता है। धर्म-पालन में भी कमी रहती है। कठिन संघर्ष, परिश्रम तथा गुप्त युक्तियों के बल पर वह थोड़ी-बहुत उन्नति भी कर लेता है। ‘मकर’ लग्न की कुण्डली के ‘दशमभाव’ स्थित ‘राहु’ का फलादेश मकरलग्न : दशमभाव : राहु दसवें भाव में मित्र ‘शुक्र’ की राशि पर स्थित ‘राहु’ के प्रभाव से जातक की पिता, राज्य तथा व्यवसाय के क्षेत्र में विघ्नों बाधाओं का सामना करना पड़ता है। परन्तु वह अपनी गुप्त युक्तियों के बल पर उन्हें दूर करता हुआ भाग्य की उन्नत बनाता है। यद्यपि उसे अनेक बार संकटों में घिर जाना पड़ता है। ‘मकर’ लग्न की कुण्डली के ‘एकादशभाव’ स्थित ‘राहु’ का फलादेश मकरलग्न : एकादशभाव : राहु ग्यारहवें भाव में शत्रु ‘मंगल’ की राशि पर स्थित ‘राहु’ के प्रभाव से जातक अपने परिश्रम तथा गुप्त युक्ति-बल द्वारा विशेष लाभ प्राप्त करता है। कभी-कभी उसे बड़ी हानि भी उठानी पड़ती है तो कभी विशेष लाभ भी होता है। उसके जीवन में सुख-दुःख आते-जाते बने रहते हैं।