भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)
Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary
महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५०१ 'मकर' लग्न की कुण्डली में 'द्वादशभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश मकरलग्न : द्वादशभाव : राहु बारहवें भाव में शत्रु 'गुरु' की राशि पर स्थित नीच के 'राहु' के प्रभाव से जातक को अपना खर्च चलाने में बड़ी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है तथा बाहरी स्थानों के सम्बन्धों से भी कष्ट उठाने पड़ते हैं। हिम्मती होने के कारण वह अपनी कठिनाइयों को प्रकट नहीं होने देता तथा उन्हें दूर करने की विशेष परिश्रम करता रहता है। 'मकर' लग्न में 'केतु' 'मकर' लग्न की कुण्डली में 'प्रथमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश मकरलग्न : प्रथमभाव : केतु पहले भाव में मित्र 'शनि' की राशि पर स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक के शारीरिक सौन्दर्य तथा स्वास्थ्य में कमी रहती है तथा कभी कोई बड़ी चोट लगने की संभावना भी रहती है। ऐसा व्यक्ति उग्र तथा जिद्दी स्वभाव का होता है तथा अपने प्रभाव को बढ़ाने के लिए गुप्त युक्तियों का आश्रय भी लेता है। 'मकर' लग्न की कुण्डली में 'द्वितीयभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश मकरलग्न : द्वितीयभाव : केतु दूसरे भाव में मित्र 'शनि' की राशि पर स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक को धन तथा कुटुम्ब के विषय में बड़े संकटों का सामना करना पड़ता है, परन्तु वह हिम्मत तथा गुप्त युक्तियों का आश्रय लेकर धन- सम्बन्धी कमी को पूरा करने के लिए प्रयत्नशील बना रहता है।