भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)
Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary
महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५०२ 'मकर' लग्न की कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश मकरलग्न : तृतीयभाव : केतु तीसरे भाव में शत्रु 'बुध' की राशि पर स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक को भाई-बहिनों के पक्ष में परेशानी तथा संकटों का सामना करना पड़ता है, परन्तु पराक्रम की अत्यधिक वृद्धि होती है । वह साहस, धैर्य, पुरुषार्थ तथा गुप्त युक्तियों के बल पर जीवन को प्रभावशाली बनाये रखने का प्रयत्न करता रहता है। 'मकर' लग्न की कुण्डली के 'चतुर्थभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश मकरलग्न : चतुर्थभाव : केतु चौथे भाव में शत्रु 'मंगल' की राशि पर स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक की माता के सुख में कमी तथा माता के कारण ही कष्ट भी प्राप्त होता है। घरेलू जीवन कलहपूर्ण रहता है। मातृ-भूमि का त्याग भी करना पड़ता है। अन्त में, कठिन परिश्रम तथा गुप्त युक्तियों के बल पर उसे सुख के साधन प्राप्त करने में थोड़ी-बहुत सफलता मिल जाती है । 'मकर' लग्न की कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश मकरलग्न : पंचमभाव : केतु पाँचवें भाव में मित्र 'शुक्र' की राशि पर स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक की सन्तान तथा विद्या के क्षेत्र में कमी का शिकार होना पड़ता है। मस्तिष्क में गुप्त चिन्ताओं का निवास रहता है। परन्तु उसकी बुद्धि तीव्र होती है, अतः वह चतुराई से काम लेकर अपनी कठिनाइयों के निवारण का प्रयत्न करता है। 'मकर' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश मकरलग्न : षष्ठभाव : केतु छठे भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक की शत्रुओं के कारण कठि- नाइयों में फँसना पड़ता है, परन्तु अपनी गुप्त युक्तियों के बल पर वह उन पर विजय भी पा लेता है। झगड़े- झंझट के मामलों में उसे सफलता मिलती है। ननसाल- पक्ष की हानि पहुँचती है। और संकट आने पर भी वह अपना धैर्य नहीं छोड़ता है ।