भारतकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

DevanagariHindipublished638 पृष्ठ

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५०३ 'मकर' लग्न की कुण्डली के 'सप्तमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश मकरलग्न : सप्तमभाव : केतु सातवें भाव में शत्रु 'चन्द्रमा' की राशि पर स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक को स्त्री-पक्ष से अनेक प्रकार के कष्ट प्राप्त होते हैं। गृहस्थ-जीवन में परेशानियां आती हैं। अनेक प्रकार के व्यवसाय करने पर भी कठिनाइयां आती रहती हैं। अन्त, में वह अपनी गुप्त युक्तियों तथा कठोर परिश्रम के द्वारा उन पर यथोचित सफलता भी पा लेता है। 'मकर' लग्न की कुण्डली के 'अष्टमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश मकरलग्न : अष्टमभाव : केतु आठवें भाव में शत्रु 'सूर्य' की राशि पर स्थित केतु के प्रभाव से जातक के जीवन पर अनेक बार संकट आते हैं और वह मृत्यु-तुल्य कष्ट पाता है। पेट में विकार रहता है। आजीविका-उपार्जन के लिए कठिन परिश्रम करना पड़ता है। भीतर से चिन्तित रहते हुए भी प्रकट में वह प्रभाव प्रदर्शित करता है। प्रायः उसका जीवन संघर्षपूर्ण रहता है। 'मकर' लग्न की कुण्डली के 'नवमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश मकरलग्न : नवमभाव : केतु नवें भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक की भाग्योन्नति में कठि- नाइयां आती हैं, परन्तु वह अपनी हिम्मत, परिश्रम तथा गुप्त युक्तियों के द्वारा उन पर विजय पाकर भाग्य की उन्नति तथा धर्म का पालन करता है। कभी-कभी उसे भाग्य-क्षेत्र में घोर संकटों का सामना करना पड़ता है, परन्तु अन्त में उनका निराकरण करने में सफल हो जाता है।