भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)
Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary
महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६० मित्रक्षेत्रस्थ 'शुक्र' मित्रक्षेत्रस्थ 'शुक्र' जिस जातक की जन्मकुण्डली में 'शुक्र' अपने मित्र ग्रहों (बुध अथवा शनि) की राशि (कन्या, मिथुन, मकर अथवा कुम्भ) में बैठा हो, वह सुखी, गुणी, सन्ततिवान्, धनवान् तथा बन्धु-बान्धवों को प्रिय होता है। मित्रक्षेत्रस्थ 'शनि' मित्रक्षेत्रस्थ 'शनि' जिस जातक की जन्मकुण्डली में 'शनि' अपने मित्र ग्रहों (बुध अथवा शुक्र) की राशि (कन्या, मिथुन, वृष अथवा तुला) में बैठा हो, वह सुखी, धनी, परान्न- भोजी, प्रेमी-स्वभाव का, कुकर्म करने वाला तथा कभी- कभी दुःख पाने वाला होता है। मित्रक्षेत्रस्थ 'राहु' मित्रक्षेत्रस्थ 'राहु' जिस जातक की जन्मकुण्डली में 'राहु' अपने मित्र ग्रहों (शुक्र अथवा शनि) की राशि (वृष, तुला, मकर अथवा कुम्भ) में बैठा हो, वह धनी, गुप्त योजना- कर्ता, सुखी, मिथ्यावादी, बुद्धिमान, पराक्रमी, साहसी तथा कुकर्म-रत होता है। मित्रक्षेत्रस्थ 'केतु' मित्रक्षेत्रस्थ 'केतु' जिस जातक की जन्मकुण्डली में 'केतु' अपने मित्र ग्रहों (शुक्र अथवा शनि) की राशि (वृष, तुला, मकर अथवा कुम्भ) में बैठा हो, वह भ्रमणशील, दुःखी तथा परोपकारी होता है।