भारतकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

DevanagariHindipublished638 पृष्ठ

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६१ शत्रुक्षेत्रस्थ ग्रहों का फलादेश अपने शत्रु की राशि में स्थित विभिन्न ग्रहों का संक्षिप्त फलादेश निम्ना- नुसार समझना चाहिए। यहाँ प्रदर्शित सभी उदाहरण-कुण्डलियां मेष लग्न की हैं। लग्न लग्नों की कुण्डलियों के विषय में भी इन्हीं के आधार पर जानकारी प्राप्त कर लेनी चाहिए। जिस जातक की जन्मकुण्डली में जितने अधिक ग्रह शत्रुक्षेत्री होते हैं, वह उतना ही दुःखी, दरिद्र, भाग्यहीन, चिन्तित तथा निराश रहता है। यदि तीन या इससे अधिक ग्रह शत्रुक्षेत्री हों, तो वह जीवनभर दुःखी रहकर अन्तिम भाग में सुख पाता है।

शत्रुक्षेत्रस्थ 'सूर्य' शत्रुक्षेत्रस्थ 'सूर्य' जिस जातक की जन्मकुण्डली में 'सूर्य' अपने शत्रु (शुक्र अथवा शनि) की राशि (वृष, तुला, मकर अथवा कुम्भ) में बैठा हो, वह सदैव दुःख पाने वाला, नौकरी करने वाला, विषयों से पीड़ित तथा नीच स्वभाव का होता है।

शत्रुक्षेत्रस्थ 'चन्द्र' शत्रुक्षेत्रस्थ 'चन्द्र' जिस जातक की जन्मकुण्डली में 'चन्द्रमा' अपने शत्रु (राहु अथवा केतु) की राशि (कन्या अथवा मिथुन) में बैठा हो, वह हृदयरोगी तथा अपनी माता के कारण दुःख पाने वाला होता है।

शत्रुक्षेत्रस्थ 'मंगल' शत्रुक्षेत्रस्थ 'मंगल' जिस जातक की जन्मकुण्डली में 'मंगल' अपने शत्रु (बुध) की राशि (मिथुन अथवा कन्या) में बैठा हो, वह विकलांग, व्याकुल, दीन-मलीन तथा स्त्रियों के वश में रहने वाला होता है।