भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)
Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary
महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६२ शत्रुक्षेत्रस्थ 'बुध' शत्रुक्षेत्रस्थ 'बुध' जिस जातक की जन्मकुण्डली में 'बुध' अपने शत्रु ग्रह (चन्द्रमा) की राशि (कर्क) में बैठा हो, वह सामान्य सुख पाने वाला, वासनाशील, कर्त्तव्यहीन, दुःखी, मूर्ख परन्तु अपनी बात का धनी होता है। शत्रुक्षेत्रस्थ 'गुरु' शत्रुक्षेत्रस्थ 'गुरु' जिस जातक की जन्मकुण्डली में 'गुरु' अपने शत्रु (शुक्र अथवा बुध) की राशि (वृष, तुला, कन्या अथवा मिथुन) में बैठा हो, वह भाग्यशाली, क्रोधी, चतुर, क्षुधातुर तथा अपनी आजीविका को स्वयं ही नष्ट कर लेने वाला होता है। शत्रुक्षेत्रस्थ 'शुक्र' शत्रुक्षेत्रस्थ 'शुक्र' जिस जातक की जन्मकुण्डली में 'शुक्र' अपने शत्रु (बुध अथवा चन्द्रमा) की राशि (सिंह अथवा कर्क) में बैठा हो, वह दास्य-वृत्ति (नौकरी) करके अपनी आजी- विका का उपार्जन करने वाला, दुःखी तथा दुर्बुद्धि होता है। शत्रुक्षेत्रस्थ 'शनि' शत्रुक्षेत्रस्थ 'शनि' जिस जातक की जन्मकुण्डली में 'शनि' अपने शत्रु (सूर्य, चन्द्र अथवा मंगल) की राशि (सिंह, कर्क, मेष अथवा वृश्चिक) में बैठा हो, वह किसी-न-किसी कारण से निरंतर चिन्तित एवं दुःखी बना रहने वाला, मलिन-हृदय वाला, रोगी तथा धनहीन होता है।