भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)
Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary
महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६३ शत्रुक्षेत्रस्थ 'राहु' शत्रुक्षेत्रस्थ 'राहु' जिस जातक की जन्मकुण्डली में 'राहु' अपने शत्रु (सूर्य, चन्द्र, अथवा मंगल) की राशि (सिंह, कर्क, मेष अथवा वृश्चिक) में बैठा हो, वह शत्रुक्षेत्री शनि जैसा फल प्राप्त करता है। सूर्य अथवा चन्द्रमा की राशि पर बैठा हो तो उनके प्रभाव को अधिक हानि पहुँचाता है। शत्रुक्षेत्रस्थ 'केतु' शत्रुक्षेत्रस्थ 'केतु' जिस जातक की जन्मकुण्डली में 'केतु' अपने शत्रु (सूर्य, चन्द्र अथवा मंगल) की राशि (सिंह, कर्क, मेष अथवा वृश्चिक) में बैठा हो, वह शत्रुक्षेत्री शनि जैसा फल प्राप्त करता है। सूर्य अथवा चन्द्रमा की राशि पर बैठा हो तो उनके प्रभाव में बहुत कमी ला देता है। नीच राशिस्थ ग्रहों का फलादेश नीच राशिस्थ विभिन्न ग्रहों का संक्षिप्त फलादेश निम्नानुसार समझना चाहिए। यहाँ प्रदर्शित सभी उदाहरण-कुण्डलियां मेष लग्न की हैं। अन्य लग्नों की कुण्डलियों के विषय में भी इन्हीं के आधार पर जानकारी प्राप्त कर लेनी चाहिए। जिस जातक की जन्मकुण्डली में जितने अधिक ग्रह नीच राशिस्थ होते हैं, वह उतना ही अशुभ फल प्राप्त करता है। यदि तीन या अधिक ग्रह नीच राशि के हों तो वह जातक मूर्ख होता है। नीचराशिस्थ 'सूर्य' नीचराशिस्थ 'सूर्य' जिस जातक की जन्मकुण्डली में 'सूर्य' नीच राशि (तुला) का हो, वह बन्धु-सेवी, पाप कर्म करने वाला, कटुभाषी, आत्म-बलहीन, किसी पर विश्वास न करने वाला, अल्पकेशी तथा विकृत दांतों वाला होता है।