भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)
Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary
महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा
पृष्ठ 578, कुल 638 में से
संदर्भ में पढ़ें५८८ 'मीन' लग्न की कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश मीन लग्न : पंचमभाव : केतु पाँचवें भाव में शत्रु 'चन्द्रमा' की राशि पर स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक की सन्तान-पक्ष में बड़े कष्ट तथा कर्म का सामना करना पड़ता है। मस्तिष्क में चिन्ताएँ घिरी रहती हैं। विद्याध्ययन में भी अनेक कठि- नाइयाँ आती हैं, परन्तु वह अपनी गुप्त युक्तियों, धैर्य तथा परिश्रम के बल पर सब कमियों को दूर करने के लिए प्रयत्नशील बना रहता है। १४५५ 'मीन' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश मीन लग्न : षष्ठभाव : केतु छठे भाव में शत्रु 'सूर्य' की राशि पर स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक शत्रु-पक्ष पर निरन्तर विजय प्राप्त करता है तथा झगड़ों के मामलों में सफलता पाता है। शत्रु-पक्ष से परेशानी होने पर भी वह अपने हौसले को बनाए रखता है तथा बहादुरी से काम लेकर उस पर अपना प्रभाव स्थापित करता है। १४५६ 'मीन' लग्न की कुण्डली के 'सप्तमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश मीन लग्न : सप्तमभाव : केतु सातवें भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक को स्त्री तथा व्यवसाय के क्षेत्र में कुछ अशान्ति एवं कठिनाइयों के साथ सफलता मिलती है। कभी-कभी स्त्री-पक्ष से घोर कष्ट मिलता है तो कभी सुख भी मिलता है। ऐसा व्यक्ति साहसपूर्वक अपनी उन्नति के लिए प्रयत्नशील बना रहता है। १४५७