भारतकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

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५८६ 'मीन' लग्न की कुण्डली के 'अष्टमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश मीन लग्न : अष्टमभाव : केतु आठवें भाव में मित्र 'शुक्र' की राशि पर स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक की आयु पर अनेक बार मृत्यु-तुल्य संकट आते हैं, परन्तु जीवन की रक्षा भी होती रहती है। पुरातत्त्व की हानि के योग भी उप- स्थित होते हैं, परन्तु वह अपनी गुप्त युक्तियों, चातुर्य तथा परिश्रम के बल पर लाभ उठा लेता है। ऐसा व्यक्ति बड़ा साहसी तथा धैर्यवान् होता है। 'मीन' लग्न की कुण्डली के 'नवमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश मीन लग्न : नवमभाव : केतु नवें भाव में शत्रु 'मंगल' की राशि पर स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक के भाग्य तथा धर्म के पक्ष में कठिनाइयां आती रहती हैं, परन्तु वह साहस, धैर्य, चातुर्य, गुप्त युक्ति तथा परिश्रम के बल पर उन पर विजय पाता है तथा उन्नति करता है। ऐसा व्यक्ति घोर संकटों के अवसर पर भी विचलित नहीं होता। अन्ततः उसके भाग्य तथा धर्म की कुछ उन्नति होती है, परन्तु यश में कमी बनी रहती है। 'मीन' लग्न की कुण्डली के 'दशमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश मीन लग्न : दशमभाव : केतु दसवें भाव में शत्रु 'गुरु' की राशि पर स्थित उच्च के 'केतु' के प्रभाव से जातक को पिता से सुख, राज्य से सम्मान तथा व्यवसाय से लाभ की प्राप्ति होती है। ऐसा व्यक्ति अपनी उन्नति के लिए कठोर परिश्रम करता है तथा गुप्त युक्तियों का आश्रय लेता है।