भारतकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

DevanagariHindipublished638 पृष्ठ

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५८६ 'मीन' लग्न की कुण्डली के 'एकादशभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश मीन लग्न : एकादशभाव : राहु ग्यारहवें भाव में मित्र 'शनि' की राशि पर स्थित 'राहु' के प्रभाव से जातक की आमदनी में विशेष वृद्धि होती है। वह अधिक मुनाफा कमाता है। कई बार धनो- पार्जन के क्षेत्र में कठिनाइयां भी आती हैं, परन्तु वह हिम्मत नहीं हारता तथा परिश्रम एवं धैर्य के साथ उन पर सफलता प्राप्त करता है। कभी-कभी आकस्मिक लाभ के अवसर भी मिलते हैं। 'मीन' लग्न की कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश मीन लग्न : द्वादशभाव : राहु बारहवें भाव में मित्र 'शनि' की राशि पर स्थित 'राहु' के प्रभाव से जातक को अपना खर्च चलाने में बड़ी कठिनाइयां आती हैं, परन्तु वह अपनी हिम्मत, धैर्य, परिश्रम तथा गुप्त युक्तियों के द्वारा उन सब पर विजय पाने का प्रयत्न करता है। उसे बाहरी स्थानों के संबंधों से भी कठिनाइयों का अनुभव होता है। 'मीन' लग्न में 'केतु' 'मीन' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश मीन लग्न : प्रथमभाव : केतु पहले भाव में शत्रु 'गुरु' की राशि पर स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक के शरीर में सांघातिक चोट लगती है तथा कभी मृत्यु-तुल्य कष्ट का सामना भी करना पड़ता है। शारीरिक सौन्दर्य एवं स्वास्थ्य में भी कमी रहती है किन्तु वह गुप्त युक्तियों तथा कठिन परि- श्रम के बल पर अपने व्यक्तित्व का विकास करता है।