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भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

DevanagariHindipublished638 पृष्ठ

५८६ 'मीन' लग्न की कुण्डली के 'एकादशभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश मीन लग्न : एकादशभाव : राहु ग्यारहवें भाव में मित्र 'शनि' की राशि पर स्थित 'राहु' के प्रभाव से जातक की आमदनी में विशेष वृद्धि होती है। वह अधिक मुनाफा कमाता है। कई बार धनो- पार्जन के क्षेत्र में कठिनाइयां भी आती हैं, परन्तु वह हिम्मत नहीं हारता तथा परिश्रम एवं धैर्य के साथ उन पर सफलता प्राप्त करता है। कभी-कभी आकस्मिक लाभ के अवसर भी मिलते हैं। 'मीन' लग्न की कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश मीन लग्न : द्वादशभाव : राहु बारहवें भाव में मित्र 'शनि' की राशि पर स्थित 'राहु' के प्रभाव से जातक को अपना खर्च चलाने में बड़ी कठिनाइयां आती हैं, परन्तु वह अपनी हिम्मत, धैर्य, परिश्रम तथा गुप्त युक्तियों के द्वारा उन सब पर विजय पाने का प्रयत्न करता है। उसे बाहरी स्थानों के संबंधों से भी कठिनाइयों का अनुभव होता है। 'मीन' लग्न में 'केतु' 'मीन' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश मीन लग्न : प्रथमभाव : केतु पहले भाव में शत्रु 'गुरु' की राशि पर स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक के शरीर में सांघातिक चोट लगती है तथा कभी मृत्यु-तुल्य कष्ट का सामना भी करना पड़ता है। शारीरिक सौन्दर्य एवं स्वास्थ्य में भी कमी रहती है किन्तु वह गुप्त युक्तियों तथा कठिन परि- श्रम के बल पर अपने व्यक्तित्व का विकास करता है।

५८८ 'मीन' लग्न की कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश मीन लग्न : पंचमभाव : केतु पाँचवें भाव में शत्रु 'चन्द्रमा' की राशि पर स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक की सन्तान-पक्ष में बड़े कष्ट तथा कर्म का सामना करना पड़ता है। मस्तिष्क में चिन्ताएँ घिरी रहती हैं। विद्याध्ययन में भी अनेक कठि- नाइयाँ आती हैं, परन्तु वह अपनी गुप्त युक्तियों, धैर्य तथा परिश्रम के बल पर सब कमियों को दूर करने के लिए प्रयत्नशील बना रहता है। १४५५ 'मीन' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश मीन लग्न : षष्ठभाव : केतु छठे भाव में शत्रु 'सूर्य' की राशि पर स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक शत्रु-पक्ष पर निरन्तर विजय प्राप्त करता है तथा झगड़ों के मामलों में सफलता पाता है। शत्रु-पक्ष से परेशानी होने पर भी वह अपने हौसले को बनाए रखता है तथा बहादुरी से काम लेकर उस पर अपना प्रभाव स्थापित करता है। १४५६ 'मीन' लग्न की कुण्डली के 'सप्तमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश मीन लग्न : सप्तमभाव : केतु सातवें भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक को स्त्री तथा व्यवसाय के क्षेत्र में कुछ अशान्ति एवं कठिनाइयों के साथ सफलता मिलती है। कभी-कभी स्त्री-पक्ष से घोर कष्ट मिलता है तो कभी सुख भी मिलता है। ऐसा व्यक्ति साहसपूर्वक अपनी उन्नति के लिए प्रयत्नशील बना रहता है। १४५७

५८६ 'मीन' लग्न की कुण्डली के 'अष्टमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश मीन लग्न : अष्टमभाव : केतु आठवें भाव में मित्र 'शुक्र' की राशि पर स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक की आयु पर अनेक बार मृत्यु-तुल्य संकट आते हैं, परन्तु जीवन की रक्षा भी होती रहती है। पुरातत्त्व की हानि के योग भी उप- स्थित होते हैं, परन्तु वह अपनी गुप्त युक्तियों, चातुर्य तथा परिश्रम के बल पर लाभ उठा लेता है। ऐसा व्यक्ति बड़ा साहसी तथा धैर्यवान् होता है। 'मीन' लग्न की कुण्डली के 'नवमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश मीन लग्न : नवमभाव : केतु नवें भाव में शत्रु 'मंगल' की राशि पर स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक के भाग्य तथा धर्म के पक्ष में कठिनाइयां आती रहती हैं, परन्तु वह साहस, धैर्य, चातुर्य, गुप्त युक्ति तथा परिश्रम के बल पर उन पर विजय पाता है तथा उन्नति करता है। ऐसा व्यक्ति घोर संकटों के अवसर पर भी विचलित नहीं होता। अन्ततः उसके भाग्य तथा धर्म की कुछ उन्नति होती है, परन्तु यश में कमी बनी रहती है। 'मीन' लग्न की कुण्डली के 'दशमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश मीन लग्न : दशमभाव : केतु दसवें भाव में शत्रु 'गुरु' की राशि पर स्थित उच्च के 'केतु' के प्रभाव से जातक को पिता से सुख, राज्य से सम्मान तथा व्यवसाय से लाभ की प्राप्ति होती है। ऐसा व्यक्ति अपनी उन्नति के लिए कठोर परिश्रम करता है तथा गुप्त युक्तियों का आश्रय लेता है।

५६० 'मीन' लग्न की कुण्डली के 'एकादशभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश मीन लग्न : एकादशभाव : केतु ग्यारहवें भाव में मित्र 'शनि' की राशि पर स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक की आमदनी में अत्य- धिक वृद्धि होती है। कभी-कभी कठिनाइयों का सामना भी करना पड़ता है, परन्तु वह साहस एवं धैर्य के साथ उन पर विजय पा लेता है। ऐसा व्यक्ति बड़ा बहादुर, धैर्यवान्, हिम्मती तथा स्वार्थी होता है।

'मीन' लग्न की कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश मीन लग्न : द्वादशभाव : केतु बारहवें भाव में मित्र 'शनि' की राशि पर स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक को खर्च के कारण कष्टों का अनुभव होता है तथा बाहरी स्थानों के सम्बन्धों से भी असन्तोष मिलता है। परन्तु वह अपनी गुप्त युक्तियों, धैर्य तथा परिश्रम के बल पर कठिनाइयों का साहस के साथ मुकाबला करता है तथा उन पर विजय पाकर उन्नति लाभ करता है।

हस्तलिखित, असली, प्राचीन भृगुसंहिता फलित-प्रकाश [कुण्डली चक्र: १, २, ३, ४, ५, ६, ७, ८, ९, १०, ११, १२] १४२३ 3 तृतीय खण्ड [ ग्रहों की युति, स्त्री-जातक तथा विशिष्ट योग आदि का वर्णन ] ५६१

५६४ ग्रहों की युति जन्मकुण्डली के किसी एक ही भाव में यदि एक से अधिक—दो, तीन, चार, पाँच, छै या सात—ग्रह बैठे हों तो उसे ग्रहों की युति कहा जाता है । विभिन्न भावों में अलग-अलग बैठे हुए ग्रह के सामान्य-फलादेश की अपेक्षा ग्रहों की युति के फलादेश में बहुत अन्तर आ जाता है, अतः ग्रहों की युति के फलादेश की अलग से जानकारी प्राप्त होना अत्यावश्यक है । प्रस्तुत प्रकरण में सर्वप्रथम 'ग्रहों की युति' के फलादेश का विवरण प्रस्तुत किया जा रहा है । आगे दी गई सभी उदाहरण-कुण्डलियां मेष-लग्न की हैं, जिनमें विभिन्न ग्रहों की युति को प्रदर्शित किया गया है, साथ ही उनके फलादेश का उल्लेख भी किया गया है। परन्तु विभिन्न व्यक्तियों की कुण्डलियां विभिन्न लग्नों की होती हैं तथा ग्रहों की युति भी विभिन्न भावों में पाई जाती है, अतः इन उदाहरण- कुण्डलियों को केवल आधार के रूप में ही ग्रहण करना चाहिए तथा ग्रहों की युति के सही फलादेश का निर्णय करते समय उनकी उच्च-नीच, मित्र-शत्रु एवं स्वराशिगत स्थिति, उन पर पड़ने वाली अन्य ग्रहों की दृष्टि आदि सभी बातों पर विचार करने के बाद ही निष्कर्ष-स्वरूप उचित फलादेश का निर्णय करना चाहिए । ग्रहों की युति के फलादेश में राहु-केतु को स्थान न देकर, केवल मुख्य सात ग्रहों की युति का ही उल्लेख किया गया है । राहु-केतु मित्र भाव में मित्र-ग्रह के घर में बैठे होते हैं, उनके प्रभाव को बढ़ाते हैं और शत्रु-ग्रह के रूप में बैठे होते हैं तो उनके प्रभाव को घटाते हैं—यह सामान्य सिद्धान्त है । राहु-केतु स्वयं कभी एक साथ नहीं बैठते—ये छाया-ग्रह होने के कारण सदैव एक-दूसरे से सातवें स्थान पर ही रहते हैं । विशेष-ज्ञातव्य ग्रहो की युति के फलादेश के सम्बन्ध में निम्नलिखित बातों को भी विशेष रूप से ध्यान में रखना चाहिए— (१) यदि जन्म के समय तीन शुभ ग्रहों की युति हो तो जातक का जीवन सुखी रहता है, परन्तु यदि तीन पाप-ग्रहों की युति हो तो जातक जीवन-भर दुःखी तथा सर्वत्र निन्दित रहता है । (२) पाँच अथवा छै ग्रहों की युति के फलस्वरूप जातक प्रायः दरिद्र तथा मूर्ख होता है । (३) तीन ग्रहों की युति वाली कुण्डली में यदि चन्द्रमा किसी पाप-ग्रह के साथ हो तो जातक की माता की मृत्यु होने की आशंका रहती है। यदि सूर्य पाप ग्रह

५६३ के भाव हो तो पिता की मृत्यु की संभावना रहती है। चन्द्रमा शुभ ग्रहों के साथ बैठा हो तो शुभ फल देता है, पाप ग्रह के साथ अशुभ फल देता है। शुभ ग्रह तथा पाप ग्रह—दोनों के साथ बैठा हो तो मिश्रित फल देता है। यही नियम सूर्य पर भी लागू होता है। (४) जन्मकुण्डली के किसी भाव पर यदि दो-तीन अथवा अधिक ग्रहों की एक साथ दृष्टि पड़ रही हो तो उसका प्रभाव भी उन ग्रहों की युति जैसा ही समझना चाहिए। अगले पृष्ठों पर विभिन्न ग्रहों की युति वाली उदाहरण-कुण्डलियों को अलग- अलग फलादेश के साथ प्रदर्शित किया जा रहा है। इनके आधार पर लग्न, भाव तथा अन्य सब बातों पर गंभीरतापूर्वक विचार करने के उपरान्त ही यथार्थ फलादेश का निर्णय करना चाहिए।

दो ग्रहों की युति का फलादेश

सूर्य और चन्द्र (१) सूर्य और चन्द्रमा की युति हो तो जातक दुष्ट, कपटी, चतुर, अभिमानी, अविनयी, क्षुद्र-हृदय, कार्य-कुशल, पराक्रमी, विषयासक्त, स्त्री के वशीभूत तथा पत्थरों का व्यवसाय करने वाला होता है।

सूर्य और मंगल (२) सूर्य और मंगल की युति हो तो जातक तेजस्वी, क्रोधी, मिथ्यावादी, मूर्ख, बलवान्, कलह-प्रिय तथा धर्म-कर्म एवं धन से रहित होता है। वह अपने बन्धु-बान्धवों से प्रेम रखता है।

५६४ सूर्य और बुध (३) सूर्य और बुध की युति हो तो जातक यशस्वी, प्रियवादी, श्रेष्ठ बुद्धिमान्, विद्वान्, मन्त्री, राजा का सेवक, वेदज्ञ, गीत-वाद्य में कुशल, कवि, सेवा-कर्म करने में पटु, स्थिर धनी, यशस्वी तथा राज्य द्वारा सम्मानित होता है। सूर्य और गुरु (४) सूर्य और गुरु की युति हो तो जातक शास्त्रज्ञ, धर्मात्मा, धनवान्, चतुर, परोपकारी, पौरोहित्य कर्म करने में कुशल, प्रसिद्ध, मित्रवान्, राज-मान्य तथा लोक-प्रसिद्ध होता है। सूर्य और शुक्र (५) सूर्य और शुक्र की युति हो तो जातक संगीत, वाद्य एवं शस्त्र-विद्या में कुशल, बुद्धिमान्, नाट्य- कार, श्रेष्ठ, कार्यक्षम, मित्रवान्, बलवान्, क्षीण-दृष्टि तथा स्त्री द्वारा धन प्राप्त करने वाला होता है। सूर्य और शनि (६) सूर्य और शनि की युति हो तो जातक विद्वान्, गुणवान्, श्रेष्ठ बुद्धि वाला, धर्मात्मा, धातु का काम करने में कुशल तथा वृद्धों के समान आचरण करने वाला होता है। कुछ विद्वानों के मत से ऐसा व्यक्ति स्त्री-पुत्र के सुख से रहित—और कुछ के मत में सुख-युक्त—होता है।

५६५ चन्द्र और मंगल [कुण्डली: लग्न में चं. १ मं., २, ३, ४, ५, ६, ७, ८, ९, १०, ११, १२] १४३० (७) चन्द्रमा और मंगल की युति हो तो जातक युद्ध-कुशल, प्रतापी, वाचारहीन, कलह-प्रेमी, धातु-शिल्प में कुशल, माता का शत्रु, रक्त-विकार का रोगी तथा व्यवसाय द्वारा जीविका उपार्जन करने वाला होता है। चन्द्र और बुध [कुण्डली: लग्न में चं. १ बु., २, ३, ४, ५, ६, ७, ८, ९, १०, ११, १२] १४३१ (८) चन्द्रमा और बुध की युति हो तो जातक कवि, सुन्दर, गुणी, प्रियवादी, दयालु, हँसमुख, अधिक बोलने वाला, विषयासक्त, कुल-धर्म का पालक तथा दुर्बल- शरीर वाला होता है। चन्द्र और गुरु [कुण्डली: लग्न में चं. १ गु., २, ३, ४, ५, ६, ७, ८, ९, १०, ११, १२] १४३२ (६) चन्द्रमा और गुरु की युति हो तो जातक सुशील, विनम्र, धर्मात्मा, परोपकारी, सच्चा मित्र, देव- ब्राह्मण-भक्त, भाई-बहिनों से स्नेह रखने वाला, धनी तथा गुप्त मन्त्र वाला होता है। चन्द्र और शुक्र [कुण्डली: लग्न में चं. १ शु., २, ३, ४, ५, ६, ७, ८, ९, १०, ११, १२] १४३३ (१०) चन्द्रमा और शुक्र की युति हो तो जातक झगड़ालू, व्यसनी, सुगन्ध-प्रिय, विक्रय-कार्य में कुशल, अनेक कार्यों का ज्ञाता तथा अल्प वस्त्राभूषणों वाला होता है।

५६६ चन्द्र और शनि [कुण्डली १: लग्न १ (चं. श.), २, ३, ४, ५, ६, ७, ८, ९, १०, ११, १२ | नीचे संख्या: १४३७] (११) चन्द्रमा और शनि की युति हो तो जातक आचारहीन, पुरुषार्थहीन, अल्प सन्ततिवान्, परस्त्रीगामी, वृद्धा स्त्री में आसक्त, हाथी-घोड़े रखने वाला, व्यवसायी तथा वेश्या द्वारा धन प्राप्त करने वाला होता है। मंगल और बुध [कुण्डली २: लग्न १ (मं. बु.), २, ३, ४, ५, ६, ७, ८, ९, १०, ११, १२ | नीचे संख्या: १४३४] (१२) मंगल और बुध की युति हो तो जातक कुरूप, कृपण, धन-हीन, मल्ल-विद्या में कुशल, लोहे अथवा सोने का व्यवसाय करने वाला, बहुस्त्री-गामी विधवा से विवाह करने वाला तथा अनेक प्रकार की औषधियों का सेवन करने वाला होता है। मंगल और गुरु [कुण्डली ३: लग्न १ (मं. गु.), २, ३, ४, ५, ६, ७, ८, ९, १०, ११, १२ | नीचे संख्या: १४३६] (१३) मंगल और गुरु की युति हो तो जातक मेधावी, शास्त्रज्ञ, शस्त्रज्ञ, मन्त्रज्ञ, वाक्पटु, शिल्प-निपुण, शीलवान्, चतुर, घोड़ों का प्रेमी, सेना का अधिकारी, प्रधान अथवा उच्च पद पाने वाला होता है। मंगल और शुक्र [कुण्डली ४: लग्न १ (मं. शु.), २, ३, ४, ५, ६, ७, ८, ९, १०, ११, १२ | नीचे संख्या: १४३७] (१४) मंगल और शुक्र की युति हो तो जातक गुणी, गणितज्ञ, प्रपंची, मिथ्यावादी, परस्त्रीगामी, अहंकारी, पापी, शठ, सबसे शत्रुता रखने वाला, परन्तु समाज में सम्मान पाने वाला होता है।

५६७ मंगल और शनि [कुण्डली १४३८: लग्न (१) मं. श., २, ३, ४, ५, ६, ७, ८, ९, १०, ११, १२] (१५) मंगल और शनि की युति हो तो जातक जादूगर, ऐन्द्रजालिक, कलह-प्रिय, चोर, मिथ्यावादी, शस्त्रज्ञ, शास्त्रज्ञ, मित्र-हीन, सुख-हीन, अपयशी, स्वधर्म की त्याग कर पर-धर्म ग्रहण करने वाला, उचित बात कहने वाला तथा विष अथवा मदिरा का निर्माता एवं विक्रेता होता है। बुध और गुरु [कुण्डली १४३९: लग्न (१) बु. गु., २, ३, ४, ५, ६, ७, ८, ९, १०, ११, १२] (१६) बुध और गुरु की युति हो तो जातक धैर्यवान्, पण्डित, नीतिज्ञ, विनयी, उदार, गुणी, सुगन्ध- प्रिय तथा नृत्य-वाद्य में कुशल होता है। बुध और शुक्र [कुण्डली १४४०: लग्न (१) बु. शु., २, ३, ४, ५, ६, ७, ८, ९, १०, ११, १२] (१७) बुध और शुक्र की युति हो तो जातक वेदज्ञ, नीतिज्ञ, शास्त्रज्ञ, प्रतापी, सुखी, शिल्पज्ञ, चतुर, सुन्दर, आनन्दी, धनी तथा अनेक लोगों पर हुकूमत करने वाला होता है। बुध और शनि [कुण्डली १४४१: लग्न (१) बु. श., २, ३, ४, ५, ६, ७, ८, ९, १०, ११, १२] (१८) बुध और शनि की युति हो तो जातक चंचल- चित्त, कलह-प्रिय, उद्योगहीन, उचित बोलने वाला, भ्रमण- शील, संगीत-काव्य आदि में कुशल तथा दुर्बल शरीर वाला होता है।

५६८ गुरु और शुक्र (१६) गुरु और शुक्र की युति हो तो जातक विद्वान्, बुद्धिमान्, गुणवान्, धर्मात्मा, शास्त्रज्ञ, शास्त्रार्थ करने वाला, अत्यन्त सुखी, यशस्वी, धनी तथा सुन्दरी स्त्री, पुत्र- मित्र आदि के सुख से युक्त होता है। गुरु और शनि (२०) गुरु और शनि की युति हो तो जातक शूर- वीर, यशस्वी, धनी, प्रधान सेनापति, कला-कुशल तथा स्त्री द्वारा इच्छित सुख प्राप्त करने वाला होता है। शुक्र और शनि (२१) शुक्र और शनि की युति हो तो जातक चपल- बुद्धि, आनन्दी, लवण तथा अम्लरस का प्रेमी, उन्मत्त- प्रकृति, शिल्प-आलेखन में प्रवीण तथा दारुण संग्राम करने वाला होता है। तीन ग्रहों की युति का फलादेश सूर्य : चन्द्र : मंगल (१) सूर्य, चन्द्र और मंगल की युति हो तो जातक शूरवीर, अस्त्रविद्या में कुशल, रक्त-विकार से ग्रस्त, स्त्री- हीन, दया-हीन तथा यन्त्रादि के निर्माण में कुशल होता है।

५६६ सूर्य : चन्द्र : बुध (२) सूर्य, चन्द्र और बुध की युति हो तो जातक विद्वान्, धनवान्, प्रियवादी, प्रतापी, श्रेष्ठ कवि अथवा कथाकार, वाक्पटु, शास्त्रज्ञ, कलाकार, सभा-प्रिय तथा राजा का सेवक होता है। सूर्य : चन्द्र : गुरु (३) सूर्य, चन्द्र और गुरु की युति हो तो जातक धर्मरमा, स्थिर-बुद्धि, चंचल, चतुर, धूर्त, पर्यटन-प्रेमी, विद्वान्, सेना-कुशल, देव-ब्राह्मण का पूजक तथा राजा का मंत्री होता है। सूर्य : चन्द्र : शुक्र (४) सूर्य, चन्द्र और शुक्र की युति हो तो जातक सुन्दर, परम तेजस्वी, अत्यन्त प्रतापी, भाग्यवान्, व्यसनी, शत्रु-संहर्त्ता, दांतों के विकार से युक्त, परधनापहारी तथा धर्म में प्रीति न रखने वाला होता है। सूर्य : चन्द्र : शनि (५) सूर्य, चन्द्र और शनि की युति हो तो जातक अत्यन्त धूर्त, धर्म का पालन करने वाला, शील-रहित, सत्कर्म करने वाला, वेश्या-प्रेमी, ब्राह्मण तथा देवताओं का भक्त, व्यर्थ परिश्रम करने वाला, हाथी-घोड़ा पालने वाला तथा धातु-कर्म में कुशल होता है।

६०० सूर्य : मंगल : बुध (६) सूर्य, मंगल और बुध की युति हो तो जातक साहसी, प्रबल पराक्रमी, निर्लज्ज, कठोर-प्रकृति, सलाह देने में चतुर तथा धन, स्त्री, पुत्र, मित्र आदि के सुख से युक्त होता है । १४४० सूर्य : मंगल : गुरु (७) सूर्य, मंगल और गुरु की युति हो तो जातक उदार-हृदय, प्रियवादी, सत्यवादी, उग्र-प्रकृति, सेनापति, नीतिज्ञ, श्रेष्ठ वक्ता, धनी, राजा का मंत्री तथा सब कार्यों के करने में कुशल होता है। १४४१ सूर्य : मंगल : शुक्र (८) सूर्य, मंगल और शुक्र की युति हो तो जातक सुन्दर, अत्यन्त चतुर, दयालु, गुणी, धनी, विनम्र, बहुत बोलने वाला, सुशील अथवा कुशील, कार्य-कुशल, नेत्र- रोगी, विषयासक्त तथा अपने कुल में श्रेष्ठ होता है। १४४२ सूर्य : मंगल : शनि (६) सूर्य, मंगल शनि की युति हो तो जातक मूर्ख, निर्धन, स्वजनों से तिरस्कृत, विकल, बन्धु-विहीन, कलह से व्याकुल, सघन रोमों वाला, रोगी तथा धन एवं पशुओं से रहित होता है। १४४३

६०१ सूर्य : बुध : गुरु (कुंडली में लग्न (१) भाव: सू. बु. गु.) (१०) सूर्य, बुध और गुरु की युति हो तो जातक शास्त्रज्ञ, शस्त्रज्ञ, लेखक, संग्राही, चतुर, अत्यन्त धनी तथा नेत्र-रोगी होता है। सूर्य : गुरु : शुक्र (कुंडली में लग्न (१) भाव: सू. बु. शु.) (११) सूर्य, बुध और शुक्र की युति हो तो जातक माता, पिता तथा गुरुजनों से तिरस्कृत, स्त्री के कारण दुःखी, आचार-विहीन, सबसे शत्रुता रखने वाला, दुर्बुद्धि तथा परदेशवासी होता है। सूर्य : बुध : शनि (कुंडली में लग्न (१) भाव: सू. बु. श.) (१२) सूर्य, बुध और शनि की युति हो तो जातक दुराचारी, परम दुष्ट, नपुंसक-जैसे स्वभाव वाला, बन्धु- बान्धवों से परित्यक्त, शत्रुद्वारा पराजित तथा नीच मनुष्यों का संगी होता है। सूर्य : गुरु : शुक्र (कुंडली में लग्न (१) भाव: सू. गु. शु.) (१३) सूर्य, गुरु और शुक्र की युति हो तो जातक पण्डित, शूरवीर, परोपकारी, अल्पभाषी, धन-हीन, नेत्र- रोगी, दुष्ट स्वभाव वाला, पराये कामों में अधिक रुचि रखने वाला तथा राजा का आश्रित होता है।

६०२ सूर्य : गुरु : शनि

कुण्डली (१४५८)
लग्न (१): सू. गु. श.
(१४) सूर्य, गुरु और कवि की युति हो तो जातक
सुन्दर, निर्भय, प्रगल्भ, विचारक, बन्धु-हितैषी, बहु मित्र-
वान्, मितव्ययी तथा राजा का प्रिय—कुछ विद्वानों
के मतानुसार, राजा से द्वेष रखनेवाला—होता है।
सूर्य : शुक्र : शनि
कुण्डली (१४५९)
:---:
लग्न (१): सू. शु. श.
(१५) सूर्य, शुक्र और शनि की युति हो तो जातक
दुराचारी, बन्धु-रहित, कुष्ठ-रोगी, कला-विहीन, सम्मान-
हीन, शत्रुओं से भयभीत तथा कुकर्मी होता है।
चन्द्र : मंगल : बुध
कुण्डली (१४६०)
:---:
लग्न (१): चं. मं. बु.
(१६) चन्द्र, मंगल और बुध की युति हो तो
जातक पापी, दुराचारी, अपमानित, अत्यन्त दीन, नीचों
का साथी, आजीविका-हीन तथा बन्धु-बान्धवों से हीन
होता है।
चन्द्र : मंगल : गुरु
कुण्डली (१४६१)
:---:
लग्न (१): चं. मं. गु.
(१७) चन्द्र, मंगल और गुरु की युति हो तो जातक
सुन्दर, बलवान्, क्रोधी, स्त्री-आसक्त, अपहरणकर्ता, पर-
स्त्री-गामी, स्त्रियों की प्रिय, सदैव प्रसन्न रहने वाला
तथा फोड़ा-फुंसी आदि के विकारों से ग्रस्त होता है।

६०३ चन्द्र : मंगल : शुक्र (१८) चन्द्र, मंगल और शुक्र की युति हो तो जातक चंचल स्वभाव वाला, निरन्तर भ्रमणशील, कुशील तथा शीत से डरने वाला होता है। उसकी माता तथा पत्नी दुष्ट स्वभाव वाली होती हैं तथा पुत्र शीलवान् होता है। चन्द्र, मंगल, शनि (१९) चन्द्र, मंगल और शनि की युति हो तो जातक कुटिल, लोक-द्वेषी, कलह-प्रिय, क्षुद्र स्वभाव वाला तथा सदैव दुःखी रहने वाला होता है। माता का उसकी बाल्यावस्था में ही देहावसान हो जाता है। चन्द्र : बुध : गुरु (२०) चन्द्र, बुध और गुरु की युति हो तो जातक बुद्धिमान्, भाग्यवान्, धनवान्, यशस्वी, तेजस्वी, अत्यन्त प्रसिद्ध, कुशल वक्ता, श्रेष्ठ मनोवृत्ति वाला तथा स्त्री, पुत्र- मित्र आदि के सुख से युक्त होता है। चन्द्र : बुध : शुक्र (२१) चन्द्र, बुध और शुक्र की युति हो तो जातक बड़ा विद्वान्, ईर्ष्यालु, दुराचारी, धन का लोभी, नीच कर्म द्वारा आजीविका उपार्जित करने वाला तथा श्राद्ध के विषय में अधिक श्रद्धालु होता है।

६०४ चन्द्र : बुध : शनि (२२) चन्द्र, बुध और शनि की युति हो तो जातक श्रेष्ठ बुद्धि वाला, कला-कुशल, महाविद्वान्, पण्डित, प्रिय- वादी, विनम्र, विश्व-प्रसिद्ध, लम्बे शरीरवाला, ग्राम का अधिपति तथा राजाओं को प्रिय होता है। १४६६ चन्द्र : गुरु : शुक्र (२३) चन्द्र, गुरु और शुक्र की युति हो तो जातक विद्वान्, मंत्रज्ञ, चतुर, कला-कुशल, राजाओं को प्रिय तथा सुन्दर शरीर वाला होता है। उसकी माता अत्यन्त सुशील होती है। १४६७ चन्द्र : गुरु : शनि (२४) चन्द्र, गुरु और शनि की युति हो तो जातक अत्यन्त चतुर, व्यवहार-कुशल, स्त्रियों को प्रिय, शास्त्रज्ञ, राजा द्वारा सम्मानित, उच्च अधिकारी तथा स्वस्थ शरीर वाला होता है। १४६८ चन्द्र : शुक्र : शनि (२५) चन्द्र, शुक्र और शनि की युति हो तो जातक वेदज्ञ, धर्मात्मा, श्रेष्ठ पुरोहित, चित्रकार, लेखक तथा सुन्दर शरीर वाला होता है। १४६९

६०५ मंगल : बुध : गुरु

+-----------------------------+
|   २   |      १      |  १२   |
|       | मं. बु. गु. |       |
|-------+-------------+-------|
| ३ | ४ |             | १०| ११|
|---|---|             |---|---|
|   |   |             |   |   |
|---|---|             |---|---|
| ५ | ६ |      ७      | ८ | ९ |
+-----------------------------+
१४७०

(२६) मंगल, बुध और गुरु की युति हो तो जातक प्रतापी, परोपकारी, संगीतज्ञ, श्रेष्ठ कवि, स्त्रियों को प्रिय, परहित-साधक तथा अपने कुल में श्रेष्ठ होता है। मंगल : बुध : शुक्र

+-----------------------------+
|   २   |      १      |  १२   |
|       | मं. बु. शु. |       |
|-------+-------------+-------|
| ३ | ४ |             | १०| ११|
|---|---|             |---|---|
|   |   |             |   |   |
|---|---|             |---|---|
| ५ | ६ |      ७      | ८ | ९ |
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१४७१

(२७) मंगल, बुध और शुक्र की युति हो तो जातक दुर्बल शरीर वाला, बहुत बोलने वाला, हीन कुल में उत्पन्न, अंगहीन, अत्यन्त उत्साही, ढीठ, धनी, चंचल तथा संतुष्ट स्वभाव का होता है। मंगल : बुध : शनि

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|   २   |      १      |  १२   |
|       | मं. बु. श.  |       |
|-------+-------------+-------|
| ३ | ४ |             | १०| ११|
|---|---|             |---|---|
|   |   |             |   |   |
|---|---|             |---|---|
| ५ | ६ |      ७      | ८ | ९ |
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१४७२

(२८) मंगल, बुध और शनि की युति हो तो जातक दुर्बल शरीर वाला, बुरे नेत्रों वाला, नेत्र-रोगी, मुख-रोगी, अत्यधिक कष्ट भोगने वाला, डरपोक, सहिष्णु, हास्य प्रिय, वन में रहने की इच्छा रखनेवाला, परदेश में रहने वाला तथा दूत-कर्म करने वाला होता है। मंगल : गुरु : शुक्र,

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|   २   |      १      |  १२   |
|       | मं. गु. शु. |       |
|-------+-------------+-------|
| ३ | ४ |             | १०| ११|
|---|---|             |---|---|
|   |   |             |   |   |
|---|---|             |---|---|
| ५ | ६ |      ७      | ८ | ९ |
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१४७३

(२९) मंगल, गुरु और शुक्र की युति तो जातक सुखी, सब को प्रसन्नता देने वाला, राजा का प्रिय, श्रेष्ठ लोगों द्वारा सम्मानित तथा उत्तम स्त्री-पुत्रों वालः होता है।

६०६ मंगल : गुरु : शनि (३०) मंगल, गुरु और शनि की युति हो तो जातक दुराचारी, कृश-शरीर निर्धन, कुकर्मी, मित्रों द्वारा निन्दित परन्तु राजा का कृपापात्र होता है। मंगल : शुक्र : शनि, (३१) मंगल, शुक्र और शनि की युति हो तो जातक अच्छे स्वभाव वाला, परदेश में रहने वाला, सदैव दुःख भोगने वाला तथा स्त्री के सुख से रहित होता है। बुध : गुरु : शुक्र (३२) बुध, गुरु और शुक्र की युति हो तो जातक सत्यवादी, परम यशस्वी, सदैव प्रसन्न रहने वाला, शत्रु- हन्ता, सुन्दर तथा राजा द्वारा सम्मानित होता है। बुध : गुरु : शनि (३३) बुध, गुरु और शनि की युति हो तो जातक अत्यन्त धनी, शीलवान्, भाग्यवान्, धैर्यवान्, पण्डित, सुखी, श्रेष्ठ वस्त्राभूषणों वाला तथा श्रेष्ठ स्त्री का पति होता है।