भारतकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

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६०२ सूर्य : गुरु : शनि

कुण्डली (१४५८)
लग्न (१): सू. गु. श.
(१४) सूर्य, गुरु और कवि की युति हो तो जातक
सुन्दर, निर्भय, प्रगल्भ, विचारक, बन्धु-हितैषी, बहु मित्र-
वान्, मितव्ययी तथा राजा का प्रिय—कुछ विद्वानों
के मतानुसार, राजा से द्वेष रखनेवाला—होता है।
सूर्य : शुक्र : शनि
कुण्डली (१४५९)
:---:
लग्न (१): सू. शु. श.
(१५) सूर्य, शुक्र और शनि की युति हो तो जातक
दुराचारी, बन्धु-रहित, कुष्ठ-रोगी, कला-विहीन, सम्मान-
हीन, शत्रुओं से भयभीत तथा कुकर्मी होता है।
चन्द्र : मंगल : बुध
कुण्डली (१४६०)
:---:
लग्न (१): चं. मं. बु.
(१६) चन्द्र, मंगल और बुध की युति हो तो
जातक पापी, दुराचारी, अपमानित, अत्यन्त दीन, नीचों
का साथी, आजीविका-हीन तथा बन्धु-बान्धवों से हीन
होता है।
चन्द्र : मंगल : गुरु
कुण्डली (१४६१)
:---:
लग्न (१): चं. मं. गु.
(१७) चन्द्र, मंगल और गुरु की युति हो तो जातक
सुन्दर, बलवान्, क्रोधी, स्त्री-आसक्त, अपहरणकर्ता, पर-
स्त्री-गामी, स्त्रियों की प्रिय, सदैव प्रसन्न रहने वाला
तथा फोड़ा-फुंसी आदि के विकारों से ग्रस्त होता है।