भारतकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

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६०१ सूर्य : बुध : गुरु (कुंडली में लग्न (१) भाव: सू. बु. गु.) (१०) सूर्य, बुध और गुरु की युति हो तो जातक शास्त्रज्ञ, शस्त्रज्ञ, लेखक, संग्राही, चतुर, अत्यन्त धनी तथा नेत्र-रोगी होता है। सूर्य : गुरु : शुक्र (कुंडली में लग्न (१) भाव: सू. बु. शु.) (११) सूर्य, बुध और शुक्र की युति हो तो जातक माता, पिता तथा गुरुजनों से तिरस्कृत, स्त्री के कारण दुःखी, आचार-विहीन, सबसे शत्रुता रखने वाला, दुर्बुद्धि तथा परदेशवासी होता है। सूर्य : बुध : शनि (कुंडली में लग्न (१) भाव: सू. बु. श.) (१२) सूर्य, बुध और शनि की युति हो तो जातक दुराचारी, परम दुष्ट, नपुंसक-जैसे स्वभाव वाला, बन्धु- बान्धवों से परित्यक्त, शत्रुद्वारा पराजित तथा नीच मनुष्यों का संगी होता है। सूर्य : गुरु : शुक्र (कुंडली में लग्न (१) भाव: सू. गु. शु.) (१३) सूर्य, गुरु और शुक्र की युति हो तो जातक पण्डित, शूरवीर, परोपकारी, अल्पभाषी, धन-हीन, नेत्र- रोगी, दुष्ट स्वभाव वाला, पराये कामों में अधिक रुचि रखने वाला तथा राजा का आश्रित होता है।