भारतकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

DevanagariHindipublished638 पृष्ठ

पृष्ठ 583, कुल 638 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 583

५६३ के भाव हो तो पिता की मृत्यु की संभावना रहती है। चन्द्रमा शुभ ग्रहों के साथ बैठा हो तो शुभ फल देता है, पाप ग्रह के साथ अशुभ फल देता है। शुभ ग्रह तथा पाप ग्रह—दोनों के साथ बैठा हो तो मिश्रित फल देता है। यही नियम सूर्य पर भी लागू होता है। (४) जन्मकुण्डली के किसी भाव पर यदि दो-तीन अथवा अधिक ग्रहों की एक साथ दृष्टि पड़ रही हो तो उसका प्रभाव भी उन ग्रहों की युति जैसा ही समझना चाहिए। अगले पृष्ठों पर विभिन्न ग्रहों की युति वाली उदाहरण-कुण्डलियों को अलग- अलग फलादेश के साथ प्रदर्शित किया जा रहा है। इनके आधार पर लग्न, भाव तथा अन्य सब बातों पर गंभीरतापूर्वक विचार करने के उपरान्त ही यथार्थ फलादेश का निर्णय करना चाहिए।

दो ग्रहों की युति का फलादेश

सूर्य और चन्द्र (१) सूर्य और चन्द्रमा की युति हो तो जातक दुष्ट, कपटी, चतुर, अभिमानी, अविनयी, क्षुद्र-हृदय, कार्य-कुशल, पराक्रमी, विषयासक्त, स्त्री के वशीभूत तथा पत्थरों का व्यवसाय करने वाला होता है।

सूर्य और मंगल (२) सूर्य और मंगल की युति हो तो जातक तेजस्वी, क्रोधी, मिथ्यावादी, मूर्ख, बलवान्, कलह-प्रिय तथा धर्म-कर्म एवं धन से रहित होता है। वह अपने बन्धु-बान्धवों से प्रेम रखता है।