भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)
Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary
महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६५ नीचराशिस्थ 'शुक्र' नीचराशिस्थ 'शुक्र' जिस जातक की जन्मकुण्डली में 'शुक्र' नीचराशि (कन्या) का हो, वह किसी-न-किसी कारणवश निरन्तर दुःखी बना रहने वाला, विनोदी, कौतुकी, चतुर, पंडित तथा सब कलाओं में कुशल होता है। नीचराशिस्थ 'शनि' नीचराशिस्थ 'शनि' जिस जातक की जन्मकुण्डली में 'शनि' नीचराशि (मेष) का हो, वह स्वतन्त्र-विचारक, बन्धु-बान्धवों से युक्त, स्वेच्छाचारी, दृढ़ शरीर बाला, उच्च अधिकारी, ग्राम आदि का अधिपति, सुखी, सुन्दर तथा चंचल स्वभाव का होता है। मतान्तर से वह दुःख एवं दरिद्रता भी भोगता है। नीचराशिस्थ 'राहु' नीचराशिस्थ 'राहु' जिस जातक की जन्मकुण्डली में 'राहु' नीचराशि (धनु, मतान्तर से वृश्चिक) का हो, वह कुरूप, पापी, दुर्बुद्धि, बन्धु-बान्धवों से हीन, खल तथा दुष्ट हृदय वाला होता है। नीचराशिस्थ 'केतु' नीचराशिस्थ 'केतु' जिस जातक की जन्मकुण्डली में 'केतु' नीचराशि (मिथुन, मतान्तर से वृष) का हो तो वह सुशील, दुःखी, काना, कामी, शत्रुजयी तथा स्त्री-विहीन होता है।