भारतकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

DevanagariHindipublished638 पृष्ठ

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६६ ग्रहों का दृष्टि-सम्बन्ध और स्थान-सम्बन्ध ग्रहों के दृष्टि सम्बन्ध दो प्रकार के होते हैं—(१) सामान्य दृष्टि सम्बन्ध और (२) पारस्परिक दृष्टि सम्बन्ध । इनके विषय में नीचे लिखे अनुसार समझना चाहिए— सामान्य दृष्टि-सम्बन्ध सामान्य दृष्टि-सम्बन्ध जब कोई ग्रह अपने स्थान से किसी अन्य स्थान (भाव) को देखता है अथवा उस स्थान (भाव) में बैठे हुए किसी ग्रह को देखता है तो उसे 'सामान्य दृष्टि- सम्बन्ध' कहा जाता है । उदाहरण कुण्डली में एकादश भाव में बैठा हुआ शनि अपने स्थान से दसवें अष्टम भाव में बैठे हुए गुरु को देख रहा है, अतः इसे गुरु के साथ शनि का 'सामान्य दृष्टि-सम्बन्ध' कहा जाएगा । इसी प्रकार अन्य ग्रहों के 'सामान्य दृष्टि-सम्बन्ध' के विषय में भी समझ लेना चाहिए । कौन-सा ग्रह अपने स्थान से किन-किन भावों को किन दृष्टियों से देखता है, इस विषय का वर्णन पहले ही किया जा चुका है । पारस्परिक दृष्टि-सम्बन्ध पारस्परिक दृष्टि-सम्बन्ध जब कोई दो ग्रह अलग-अलग भावों में बैठे हुए एक दूसरे के ऊपर अपनी दृष्टि डालते हैं तो उसे उन ग्रहों का 'पारस्परिक दृष्टि-सम्बन्ध' कहा जाता है । उदाहरण कुण्डली में लग्न में बैठा हुआ मंगल सप्तम भाव में बैठे हुए शनि पर अपनी पूर्ण दृष्टि डाल रहा है तथा सप्तम भाव में बैठा हुआ शनि लग्न में बैठे हुए मंगल को पूर्ण दृष्टि से देख रहा है । अतः यह दोनों ग्रहों का पारस्परिक दृष्टि- सम्बन्ध हुआ । इसी प्रकार अन्य ग्रहों के बारे में भी समझ लेना चाहिए । स्थान सम्बन्ध स्थान-सम्बन्ध जब कोई दो ग्रह अलग-अलग एक दूसरे के स्थान (भाव) में बैठे हों, तो उसे उन ग्रहों का 'स्थान-सम्बन्ध' कहा जाएगा । उदाहरण कुण्डली में चन्द्रमा की कर्क राशि में शुक्र बैठा है तथा शुक्र की वृष राशि में चन्द्रमा बैठा है । इस प्रकार ये दोनों ग्रह एक-दूसरे के स्थान में बैठे हैं ।

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