भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)
Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary
महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६७ फलतः इनमें 'स्थान-सम्बन्ध' हो गया । इसी भाँति अन्य ग्रहों के 'स्थान-सम्बन्ध' के बारे में भी समझ लेना चाहिए । ग्रहों का जातक के जीवन पर प्रभाव उक्त 'सामान्य दृष्टि-सम्बन्ध', 'पारस्परिक दृष्टि-सम्बन्ध' तथा 'स्थान- सम्बन्ध' के कारण ग्रह अपने गुण-कर्म-स्वभाव आदि का एक दूसरे से मिलकर, जातक के जीवन पर प्रभाव डालते हैं । तात्पर्य यह कि ऐसे सम्बन्धों से एक ग्रह का स्वभाव दूसरे में सम्मिलित हो जाता है । ऐसी स्थिति में, यदि दोनों ग्रह परस्पर 'मित्र' हुए तो वे जातक के जीवन पर अपना विशेष प्रभाव प्रदर्शित करेंगे, यदि 'शत्रु' हुए तो एक-दूसरे के विपरीत प्रभाव डालेंगे, और यदि 'सम' हुए तो संयुक्त सामान्य-प्रभाव डालेंगे । ग्रहों के उक्त पारस्परिक सम्बन्धों का विचार करते समय उनकी उच्च-नीच, स्वक्षेत्री, शत्रुक्षेत्री आदि स्थितियों पर भी विचार करना आवश्यक है । उन सबके समन्वय स्वरूप जो निष्कर्ष निकलेगा, वही सच्चा फलादेश होगा । लग्न और राशि जन्मकुण्डली में द्वादश भाव होते हैं। जातक के जन्म के समय जो राशि आकाशमण्डल में दिखाई दे रही होती है, उसी को 'लग्न' मान कर कुण्डली के प्रथम भाव में स्थापित किया जाता है, शेष राशियों को क्रमशः उससे आगे के भावों में स्थापित किया जाता है। उदाहरण के लिए यदि किसी जातक का जन्म आकाशमण्डल में सिंह राशि के दिग्दर्शन के समय हुआ तो सिंह राशि के सूचक अंक ५ को जन्म- कुण्डली के प्रथम भाव में लिखा जाएगा और वह कहा जाएगा कि जातक का जन्म सिंह लग्न में हुआ है । उसी समय भचक्र में चन्द्रमा यदि सिंह राशि में ही भ्रमण कर रहा होगा तो चन्द्रमा को भी कुंडली के पहले भाव अर्थात् लग्न वाले खाने में ही लिखा जाएगा और यह कहा जाएगा कि जातक का जन्म सिंह लग्न तथा सिंह राशि में ही हुआ है । परन्तु यदि चन्द्रमा उस समय भचक्र की तुला राशि में भ्रमण कर रहा होगा तो चन्द्रमा की कुंडली के तीसरे खाने अर्थात् अंक ७ वाली जगह में लिखा जायगा और यह कहा जायगा कि जातक का जन्म सिंह लग्न में तथा तुला राशि में हुआ है । लग्न और राशि के इस अन्तर को खूब अच्छी तरह समझ लेना चाहिए । जातक की जन्मकुंडली के प्रथम भाव में जिस राशि का अंक होगा, उसे जातक की 'लग्न' कहा जाएगा तथा जिस भाव में चन्द्रमा की स्थिति होगी, उसे जातक की 'राशि' कहा जाएगा ।