भारतकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

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६३० (२६) जिस स्त्री की जन्म-कुण्डली में मंगल, शुभ और बुध बलवान हों तथा लग्न समराशि में हो (चित्र १५६९), वह ब्रह्मविद्या में प्रवीण, अनेक शास्त्रों की जानकार तथा ब्रह्म- वादिनी होती है। (२७) जिस स्त्री की जन्मकुण्डली के सप्तम भाव में पाप-ग्रह बैठा हो तथा नवम भाव में कोई अन्य ग्रह बैठा हो (चित्र १५७०), वह स्त्री संन्यासिनी हो जाती है। नवें घर में जो ग्रह बैठा हो, उसी की प्रव्रज्या समझनी चाहिए। सूर्य से तपस्विनी, चन्द्रमा से कपालिनी, मंगल से रक्त- वस्त्र-धारिणी, शुक्र से चक्रिणी, शनि से नग्ना, बुध से दण्डी तथा गुरु से यति होती है। (२८) जिस स्त्री की जन्मकुण्डली में केन्द्र में शुभ ग्रह बैठे हों तथा पाप-ग्रह ६, ८ या १२वें घर में हों तथा सप्तम भाव में पुरुष राशि हो (चित्र १५७१), वह शान्त स्वभाव की, ऐश्वर्य- शालिनी, पुत्रवती तथा रानी अथवा रानी-जैसी होती है। (२९) जिस स्त्री की जन्मकुण्डली में बुध लग्न में उच्च का होकर बैठा हो तथा गुरु एकादश भाव में हो (चित्र १५७२), वह ऐश्वर्य- शालिनी, रानी अथवा रानी-जैसी होती है तथा उसकी गणना संसार की प्रसिद्ध स्त्रियों में की जाती है।