भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)
Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary
महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा
पृष्ठ 621, कुल 638 में से
संदर्भ में पढ़ें६३१ विशिष्ट योग जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित विभिन्न ग्रहों की विशिष्ट स्थिति के कारण विशिष्ट योग भी बनते हैं, जिनका फलादेश सामान्य स्थिति वाले ग्रहों से भिन्न होता है। अगले पृष्ठों में कुछ ऐसे ही विशिष्ट फलादेशों का वर्णन किया जा रहा है। सहस्रों प्रकार के विशिष्ट योगों के फलादेश की विस्तृत जानकारी प्राप्त करने के लिए हमारी लिखी पुस्तक 'योग-रत्नाकर' का अध्ययन करना चाहिए। राजयोग (१) लग्न में चन्द्रमा और गुरु, दसवें भाव में शुक्र एवं तुला, मकर अथवा कुम्भ में शनि हो तो जातक राजा के समान अथवा राजमान्य होता है। (२) दसवें, ग्यारहवें, पहले, दूसरे तथा तीसरे भाव में संपूर्ण शुभ ग्रह बैठे हों तो जातक राजा के समान होता है। (३) गुरु बुध के साथ बैठा हो अथवा बुध के द्वारा दृष्ट हो तथा गुरु, मीन अथवा धनुराशि का होकर, केन्द्र में बैठा हो तो ऐसे जातक की आज्ञा को राजागण भी अपने मस्तक पर धारण करते हैं।