भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)
Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary
महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा
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६३२ (४) चन्द्रमा केन्द्र में हो तथा गुरु लग्न को छोड़ कर, नवम अथवा पंचम दृष्टि से केन्द्र को देख रहा हो, साथ ही बलवान दृष्टि से शुभ को भी देखता हो तो जातक राजा के समान भाग्यशाली होता है। (५) गुरु लग्न में तथा बुध केन्द्र में बैठा हो तथा यह नवम भाव के स्वामी द्वारा दृष्ट भी हो तो जातक राजमान्य होता है। (६) गुरु सातवें, नवें अथवा पाँचवें भाव में बैठा हो तथा लग्नेश की उस पर दृष्टि भी हो तो जातक राजमान्य होता है। (७) शनि केन्द्र, पंचम अथवा नवम भाव में अपनी उच्च राशि अथवा मूल त्रिकोण राशि में हो तथा दशम भाव पर उसकी दृष्टि भी हो तो जातक राजमान्य होता है।