भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)
Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary
महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा
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६३३ (८) नवम भाव का स्वामी चन्द्रमा के साथ द्वितीय भाव में बैठा हो तो जातक राजमान्य होता है। १४८० (९) चन्द्रमा मंगल के साथ द्वितीय अथवा तृतीय भाव में बैठा हो अथवा राहु के साथ पंचम भाव में बैठा हो तो जातक राजमान्य होता है। १४८१ (१०) यदि जन्म-काल में पाँच ग्रह उच्च के हों, तो जातक चक्रवर्ती राजा अथवा मंत्री होता है। १४८२ (११) यदि जन्म-काल में बुध उच्च राशि का हो, मंगल तथा शनि मकर राशि में हों तथा गुरु, चन्द्रमा तथा शुक्र तीनों धनु राशि में बैठे हों तो ऐसा जातक महाराजाधिराज होता है। १४८३