भारतकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

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६४० (३६) पापग्रह लग्न में हो और उस पर कर्क के गुरु की दृष्टि पड़ रही हो, तो ऐसा व्यक्ति बड़ा धनी तथा यशस्वी राजा अथवा राजा के समान होता है। (३७) गुरु मकर राशि के अतिरिक्त किसी और लग्न में बैठा हो अथवा कर्क राशिगत होकर कर्क के नवांश में हो तो जातक राजा होता है। (३८) गुरु चन्द्रमा के साथ केन्द्र में बैठा हो तथा उस पर शुक्र की दृष्टि हो एवं कोई ग्रह नीच का न हो तो ऐसा जातक यशस्वी राजा होता है। (३६) द्वितीय भाव में बुध, शुक्र और गुरु बैठे हों तथा सप्तम भाव में मंगल और चन्द्रमा हों, तो ऐसा व्यक्ति शत्रुजयी एवं अत्यन्त प्रतापी राजा होता है।