भारतकोश
बीजगणितम् (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय समीकरण एवं बीजगणित सूत्र सटीक)

बीजगणितम् (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय समीकरण एवं बीजगणित सूत्र सटीक)

Bijaganitam of Bhaskaracharya II with Hindi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय द्वारा

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१४ बीजगणिते तथा कृते जातो गुणकः क १८ क ३ । गुण्यः क २५ क ३ । गुणिते जातम् रू ३ क ४५० क ७५ क ५४ । विशेषसूत्रं वृत्तम् । (१)क्षयो भवेच्च क्षयरूपवर्गश्चेत् साध्यतेऽसौ करणीत्यहेतोः । ऋणात्मिकायाश्च तथा करण्या मूलं क्षयो रूपविधानहेतोः ॥१३॥ द्वितीयोदाहरणे न्यासः— . गुणकः क २५ क ३ क १२ । गुण्यः क २५ क ३ । अत्र गुणके करण्योर्योगे कृते गुणकः क २५ क २७ । गुणिते जातम् क ६२५ क ६७५ क ७५ क ८१ । एतास्त्वनयोः क ६२५ क ८१ मूले रू २५ रू ९ । अनयोर्योगे जातम् रू १६ अनयोः क ६७५ क ७५ । अन्तरे योग इति जातो योगः क ३०० । यथाक्रमं न्यासः— रू १६ क ३०० । इति करणीगुणनम् । पूर्वगुणनफलस्य स्वगुणच्छेदस्य भागहारार्थं न्यासः— भाज्यः क ९ क ४५० क ७५ क ५४ । भाजकः क २ क ३ क ८ । अत्र क २ क ८ एनयोः करण्योर्योगे कृते जातम् क १८ क ३ । “भाज्याच्छेदः शुद्ध्यति प्रच्युतः सन्” इत्यादिकरणेन लब्धो गुण्यः रू ५ क ३ । द्वितीयोदाहरणे न्यास.—भाज्य. क २५६ क ३०० । भाजकः क २५ क ३ क १२। करण्योर्योगे कृते जातम् क २५ क २७ । (१) यथा यदि रूपत्रयेण ऋणेन करणीद्वयं धनं गुण्यते तदा गुणनफ- लम् = (-३) √२ = √((-३)² × २) = √१८ अत साम्प्रतमिद न ज्ञायते यद-१८ स्य मूल धनगुणं वाऽपेक्षित परन्तु करणीद्वयं धनं यदि रूपत्रयेण ऋणेन गुण्यते तदावश्यं गुणनफलमृणं स्यादतोऽत्रा-१८ स्य मूलमृणमेवोचितम् । १८ अस्य मूलमत्र ऋणमस्तीति ज्ञानाय किमपि चिह्नविशिष्टमपेक्षितं तथाचार्येणोर्ध्वबिन्दुना क्षयचिह्नेन बोधितमिति । यथा, क १६˙ अनेन षोडशानां धनानां मूलमत्र ऋणम- स्तीति बोध्यं न हि ऋणषोडशानां मूलमिति गणितविदां निर्मलधिया स्फुटमेव ।