बीजगणितम् (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय समीकरण एवं बीजगणित सूत्र सटीक)
Bijaganitam of Bhaskaracharya II with Hindi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१८ बीजगणिते पृथक् तदर्थे करणीद्वयं स्यान्मूलेऽथ बह्वी करणी तयोर्या । रूपाणि तान्येव कृतानि भूयः शेषाः करण्यो यदि सन्ति वर्गे ॥१८॥ उदाहरणम्-द्वितीयवर्गस्य मूलार्थे न्यासः-रू ५ क २४। रूपकृतेः २५ करणीतुल्यानि रूपाणि २४ अपास्य शेषम् १। अस्य मूलेन १ ऊ- नाधिकरूपाणामर्धे जाते मूलकरण्यौ क २ क ३। प्रथमवर्गस्य न्यासः-रू १० क २४ क ४० क ६०। रूपकृतेः १०० चतुर्विं- शतिचत्वारिंशत्करण्योस्तुल्यानि रूपाण्यपास्य शेषम् ३६। अस्य मूलेनोनाधिकरूपाणामर्धे जाते २।८। तत्रापीयं २ मूलकरणी। द्वितीयां रूपाण्येव प्रकल्प्य पुनः शेषकरणीभिः स एव विधिः कार्य- स्तत्रेयं रूपकृतिः ६४। अस्याः षष्टीरूपाण्यपास्य शेषम् ४। अस्य मूलम् २। अनेनोनाधिकरूपाणामर्धे ३।५ जाते। मूलकरणी क ३ क ५। मूलकरणीनां यथाक्रमं न्यासः क २ क ३ क ५। तृतीयवर्गस्य न्यासः-रू १६ क १२० क ७२ क ६० क ४८ क ४० क २४। रूपकृतेः २५६। करणीत्रितयस्यास्य क ४८ क ४० क २४। तुल्यानि रूपाण्यपास्योक्तवज्जाते खण्डे २। १४। महती रूपाणीत्यस्याः १४ कृतिः १९६। अस्य करणीद्वयस्यास्य क ७२ क १२०। तुल्यरूपण्य- पास्योक्तवज्जाते खण्डे ६।८। पुनः रूपकृतेः ६४। षष्टीरूपाण्यपास्यो- क्तवत् खण्डे ३।५। एवं मूलकरणीनां यथाक्रमं न्यासः क ६ क ५ क ३ क २। चतुर्थस्य न्यासः-रू ७२। इयमेव लब्धा मूलकरणी क ७२। पूर्वं खण्ड- त्रयमासीदिति "वर्गेण योगकरणी विहृता विशुद्धे"दिति षट्त्रिंशता विहृता शुध्यतीति षट्त्रिंशतो मूलम् ६। एतस्य खण्डानां १।२।३। वर्गाः १।४।९ पूर्वलब्ध्याऽनया २ क्षुण्णाः २।८।१८। एवं पृथक् करण्यो जाताः क २ क ८ क १८। अथ वर्गगतवर्णकरण्या मूलानयनार्थं सूत्रं वृत्तम्।