भारतकोश
बीजगणितम् (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय समीकरण एवं बीजगणित सूत्र सटीक)

बीजगणितम् (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय समीकरण एवं बीजगणित सूत्र सटीक)

Bijaganitam of Bhaskaracharya II with Hindi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय द्वारा

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करणीषड्विधम् १९ (१) ऋणात्मिका चेत् करणी कृतौ स्याद्धनात्मिकां तां परिकल्प्य साध्ये । मूले करण्याधनयोर्भीष्टा क्षयात्मिकैका सुधियाऽवगम्या ॥ १९ ॥ उदाहरणम् । त्रिसप्तमितयोर्वद मे करण्योर्विश्लेषवर्गं कृतितः पदं च । न्यासः क ३̇ क ७ । यद्वा क ३ क ७̇ । अनयोर्वर्गः सम एव रू १० क ८̇४ । अत्र वर्गे ऋणकरण्या धनत्वं प्रकल्प्य प्राग्वल्लव्धकरण्योरेका- ऽभीष्टा ऋणगता स्यादिति जातम् क ३̇ क ७ । वा क ३ क ७̇ । उदाहरणम् । द्विकत्रिपञ्चप्रमिताः करण्यः स्वस्वर्णगा व्यस्तधनर्णगा वा । तासां कृतिं ब्रूहि कृतेः पदं च चेत् षड्विधं वेत्सि सखे करण्याः॥ न्यासः । क २ क ३ क ५̇ । वा क २̇ क ३̇ क ५ । आसां वर्गः सम एव जातः रू १० क २४ क ४̇० क ६̇० । अत्र ऋणकरण्योस्तुल्यानि धनरूपाणि १०० । रूपकृतेः १०० । अ- पास्य शेषस्य मूलम् ० । अनेनोनाधिकरूपाणामर्धे क ५ । क ५ । अत्रैका ऋणम् क ५̇ । अन्या रूपाणीति । न्यासः रू ५ क २४ । पूर्ववज्जाते करण्यौ धने एव क ३ क २ । यथाक्रमं न्यासः क २ क ३ क ५̇ । अथ वाऽनयोः क २४ क ६० तुल्यानि धनरूपाणि ८४ । रूपकृतेः १०० । अपास्योक्तवज्जाते मूलकरण्यौ क ७ क ३ । अनयोर्महती ऋणं क ७̇ । तान्येव रूपाणि प्रकल्प्य रू ७ क ४० । अतः प्राग्वत् करण्यौ क ५ क २ । अनयोरपि महती ऋणमिति यथाक्रमं न्यासः क ३ क २ क ५̇ । अथ द्वितीयोदाहरणे । प्राग्वत् प्रथमपक्षे मूलकरण्यौ क ५ क ५ । अनयोरेका ऋणं क ५̇ तान्येव रूपाणीति ऋणोत्पन्ने करणी- खण्डे ऋणे एवेति यथाक्रमं न्यासः क ३̇ क २̇ क ५ । (१) यतः ( √अ + √क )² = अ + क + √४ अक । ( √अ - √क )² = अ + क - √४ अक अतो वर्गद्वयेऽपि रूपकरण्योर्माने समाने तेन ऋणात्मिकां करणीं धनात्मिकां परिकल्प्य मूलं साधितं तत्र मूले यथा योग्यैका करणी ऋणा- त्मिका कल्प्येति ।