भारतकोश
बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans

नरपति नाल्ह द्वारा

DevanagariHindipublished315 पृष्ठ

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भूमिका

'बीसलदेव रासो' की हस्तलिखित प्रति का पता सबसे पहले 'काशी नागरी प्रचारिणी सभा' को सन् १९०० ई० में हिन्दी की हस्तलिखित पुस्तकों की खोज करते समय जयपुर में लगा था¹। श्री सत्यजीवन जी शर्मा द्वारा नागरी- प्रचारिणी सभा ने इस प्राचीन ग्रन्थ को सम्पादित करवा कर सन् १९२५ ई० में प्रकाशित भी कर दिया। इसके पश्चात् श्री अगरचन्द नाहटा ने प्रकाशित ग्रन्थ की भाषा तथा उसके ऐतिहासिक और भौगोलिक उल्लेखों को ध्यान में रख कर यह आवश्यक समझा कि इस ग्रन्थ की अन्य हस्तलिखित प्रतियों की खोज की जाय। इस दिशा में उन का प्रयत्न अंशतः सफल रहा। सर्वप्रथम उन्होंने 'राजस्थानी' पत्रिका में इस ग्रन्थ की जयपुरवाली प्रति के अतिरिक्त १५ अन्य प्रतियों का उल्लेख किया²। इस उल्लेख में कुछ ऐसी प्रतियों का भी उल्लेख था, जिन का पूर्ण परिचय नाहटा जी को उस समय तक प्राप्त न हो सका था। अस्तु पुनः उन्होंने 'राजस्थान-भारती'³ में अपूर्ण परिचयवाली प्रतियों तथा अन्य प्राप्त प्रतियों का उल्लेख किया। इस प्रकार अब प्राप्त प्रतियों की संख्या १५ के बजाय २६ हो गयी। ये प्रतियाँ जोधपुर, बीकानेर, जयपुर तथा कोटा के विभिन्न पुस्तक-भंडारों में सुरक्षित हैं। मुझे एशियाटिक सोसाइटी (बंगाल) कलकत्ता, में दो हस्तलिखित प्रतियों को देखने का अवसर मिला। इन दोनों प्रतियों का उल्लेख नाहटाजी के लेखों में नहीं है। इनके अतिरिक्त नाहटाजी के लेखों में उन चार तथा दो पत्रों वाली प्रतियों का भी उल्लेख नहीं है, जो मुझे देखने को मिलीं। अतः नीचे अब तक प्राप्त उन २७ प्रतियों का परिचय दिया जा रहा है, जिनमें से १५ हमारी निजी देख हुई हैं तथा १२ श्री नाहटा जी के लेख के आधार पर हैं।

( 1 ) Annual Report on the search for Hindi Mss. for the year 1900. Notice No. 90, page 77. (२) राजस्थानी (त्रैमासिक पत्रिका)—भाग ३, अंक १, पृ० १८। (३) राजस्थान भारती—पृ० ८४।