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बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह - अजमेर के चौहान विग्रहराज चतुर्थ का ऐतिहासिक काव्य)

Bisaldev Raso of Narapati Nalha on Ajmer Chauhans

नरपति नाल्ह द्वारा

DevanagariHindipublished315 पृष्ठ

भूमिका

'बीसलदेव रासो' की हस्तलिखित प्रति का पता सबसे पहले 'काशी नागरी प्रचारिणी सभा' को सन् १९०० ई० में हिन्दी की हस्तलिखित पुस्तकों की खोज करते समय जयपुर में लगा था¹। श्री सत्यजीवन जी शर्मा द्वारा नागरी- प्रचारिणी सभा ने इस प्राचीन ग्रन्थ को सम्पादित करवा कर सन् १९२५ ई० में प्रकाशित भी कर दिया। इसके पश्चात् श्री अगरचन्द नाहटा ने प्रकाशित ग्रन्थ की भाषा तथा उसके ऐतिहासिक और भौगोलिक उल्लेखों को ध्यान में रख कर यह आवश्यक समझा कि इस ग्रन्थ की अन्य हस्तलिखित प्रतियों की खोज की जाय। इस दिशा में उन का प्रयत्न अंशतः सफल रहा। सर्वप्रथम उन्होंने 'राजस्थानी' पत्रिका में इस ग्रन्थ की जयपुरवाली प्रति के अतिरिक्त १५ अन्य प्रतियों का उल्लेख किया²। इस उल्लेख में कुछ ऐसी प्रतियों का भी उल्लेख था, जिन का पूर्ण परिचय नाहटा जी को उस समय तक प्राप्त न हो सका था। अस्तु पुनः उन्होंने 'राजस्थान-भारती'³ में अपूर्ण परिचयवाली प्रतियों तथा अन्य प्राप्त प्रतियों का उल्लेख किया। इस प्रकार अब प्राप्त प्रतियों की संख्या १५ के बजाय २६ हो गयी। ये प्रतियाँ जोधपुर, बीकानेर, जयपुर तथा कोटा के विभिन्न पुस्तक-भंडारों में सुरक्षित हैं। मुझे एशियाटिक सोसाइटी (बंगाल) कलकत्ता, में दो हस्तलिखित प्रतियों को देखने का अवसर मिला। इन दोनों प्रतियों का उल्लेख नाहटाजी के लेखों में नहीं है। इनके अतिरिक्त नाहटाजी के लेखों में उन चार तथा दो पत्रों वाली प्रतियों का भी उल्लेख नहीं है, जो मुझे देखने को मिलीं। अतः नीचे अब तक प्राप्त उन २७ प्रतियों का परिचय दिया जा रहा है, जिनमें से १५ हमारी निजी देख हुई हैं तथा १२ श्री नाहटा जी के लेख के आधार पर हैं।

( 1 ) Annual Report on the search for Hindi Mss. for the year 1900. Notice No. 90, page 77. (२) राजस्थानी (त्रैमासिक पत्रिका)—भाग ३, अंक १, पृ० १८। (३) राजस्थान भारती—पृ० ८४।

— १ — प्राप्त हस्तलिखित प्रतियों का परिचय [ १ ] नाम--बीसलदेय रासो। कागज--देशी (हाथ का बना हुआ)। पत्र--२७ पत्र, दोनों तरफ लिखे हुए। आकार--११ ई. x ५ ई.। पंक्तियों--१५ से १६ पंक्तियाँ प्रत्येक पृष्ठ पर। पद्य संख्या--२४६। प्रकार-- पुराना, पूर्ण; साधारणतया ठीक। अक्षर--देवनागरी। सुरक्षित स्थान--जोधपुर में पोकरण के पास फलौदी के धीयुत फूलचन्द जी छावर के पास। [ गुप्त स० पुष्पिका--इति श्री बीसलदे रास समाप्तं। संवत् समूह न० ३, १६३३ वर्षे वैशाख वदि ११ दिना चादित्यवारे। लिखतं संकेत ग० ] आगरा मध्ये पं० सीहा लिखत। संपूर्ण। आदि--गवर का नंदन त्रिभुवन सार। नादभेदइ थारह उमर भण्डार। एक दन्तउ सुथिरु छहूअह। सुविकट धारण तिलक संदूरि। कर जोडी नरपति भणइ। जाणि करि रोहणी जिमवणउ सूरि॥ अंत--कनक काया जैसी फूलू रोझ। कठिन पयोधर रतनक घोरा। केलि गरम सी कूं बली। घालइ पूणउ पाचह नीक। मोटि कटि घालह गोहरी। उसकी विरह वेदना नां लहइ कोइ। जिठ राजा राणी मिल्या। रयठ नाल्ह कहइ मिलि उयो सह कोइ ॥ २४६ ॥ रचना तिथि--सघन सहस्सतिहिवरइ जाणि। नलह कविसरि कही अमृत वांणि। गुण गुध्यू चउहाण का सुफछ पक्ष पंचमी श्रावण मास। रोहणी नक्षत्र सोहामणउ। सो दिन सिरि ओइसा ओइह रास। टि०--प्राप्य तिथियुक्त प्रतियों में यही सबसे प्राचीन है। [ २ ] नाम--राजा बीसलदे रासा। कागज - देशी [ गुप्त स० (हाथ का बना हुआ), पत्र--सोलह पत्र दोनों तरफ लिखे समूह न० १५, हुए। आकार--८३ ईं. x ८ ईं.। पंक्तियों--२६ पंक्तियाँ संकेत म० ] प्रत्येक पृष्ठ पर। पद्यसंख्या--६१३। प्रकार--पुराना; पूर्ण,

  • ३ - साधारणतया ठीक; चार खण्डों में विभाजित । अक्षर— देवनागरी । सुरक्षित स्थान--विद्याप्रचारिणी जैन सभा, जयपुर । श्री अगरचन्दजी नाहटा ने 'राजस्थान भारती', पृ० ८३ में लिखा है कि "सं० १६५६ लिखित मदनपरा गुटका हमारे संग्रह में खरीद करके संग्रह कर लिया गया है।" पुष्पिका—इति राजा बीसलदे रास राजमती च्यारै- खण्ड संपूर्ण भवति । संवत १६५६ वर्षे फागुण वदि १ भौमे दिवसैं फूलपेड़ा मध्ये राज्य श्री बीवी राजचंदजी राज्ये । शुभ भवतु । आदि—श्री गुरुभ्योनमः । हंसवाहन मृगलोचनी नारि । सीस समारह दिन गिसह । झिल सिरजह उजिगाणा घरी नारि । जाई चीदाउद शरीती ॥ १ ॥ गौरिका नंदन त्रिभुवन सार ॥ नाद पेया थारह उदिर भंडार ॥ कर जोड़ नरपति कहई ॥ मूसा वाहन विघ्नस्यंदूर ॥ एक दन्तउ मुख राक्षसखई । जांणिक रोहणीउ नवर सूर ॥ अन्त—ज्यूं तारायण मिलियो चंद्र । गोवल मांहि मिलहू ज्यूं गोव्यन्द ! ज्यूं उझीरीयान्ह घरी मीहयो । गहि उजिगांण्हई दीधो हो बास । मन का मनोरथ पूरभ्या । भणई सूणईं तिणि पूज्यो आस ॥ रचनातिथि—बारह सै बहोत्तराँ हाँ मंझारि । जेठ बदी नवमी बुधवारि ॥ "नाल्ह" रसायण आरंभइ । सारदा' तुठि ब्रह्म-कुमारि । कासमीराँ-दुहा-मण्डणी । रास प्रगासौ बीसल-दे राइ । टि०—यही प्रति नागरी प्रचारिणी सभा द्वारा प्रकाशित हुई है :— [ ३ ] नाम—श्री वीसलदे रास । कागज—देशी (हाथ का बना हुआ) आकार—११ ई० x ५ ई० । पंक्तियाँ-१५ से १६ प्रत्येक पृष्ठ पर । पद्यसंख्या—२४६ । प्रकार—पुराना; पूर्ण; साधारणतया ठीक । अक्षर—देव-
  • २ - प्राप्त हस्तलिखित प्रतियों का परिचय [ १ ] नाम--बीसलदेप रासो। कागज-देशी (हाथ का बना हुआ)। पत्र-२७ पत्र, दोनों तरफ लिखे हुए। आकार-११ ई. x ५ ई । पंक्तियाँ--१५ से १६ पंक्तियाँ प्रत्येक पृष्ठ पर। पद्य संख्या-२४६। प्रकार- पुराना, पूर्ण; साधारणतया ठीक। अक्षर-देवनागरी। सुरक्षित स्थान-जोधपुर में पोकरण के पास फलौदी के श्रीयुक्त फूलचन्द जी छाबर के पास। [ गुप्त स० समूह क्र० ३, सकेत ग० ] पुष्पिका-इति श्री वीसलदे रास समाप्त। संवत् १६३३ वर्षे वैशाष वदि १२ दिने आदित्यवारे। लिषतं आगरा मध्ये पं० सोढा लिषतं । संपूर्णं । आदि-स्वर का नदन त्रिभुवन सार। नादभेदहू शारह उत्तर भण्डार। एक दन्तउ मुषिक सहस्रद। सुविकट धाइण तिलक संदूरि । कर मोडी नरपति भणइ । जाणि करि रोहिणी हिमकण्ठ सूरि ॥ अंत-कनक काया जिसी क्रूर रोख। कठिन पयोधर रतनउ थोक। केलि सरभ सी कू घणी। चालइ पूषणउ पाचइ नीक। मोडिकोट चालहू गोहरी। ठाकुरी विरह वेदना नां सहह कोइ । जिउ राजा राणी मिल्या । स्यउ नाहड कड़इ मिलि ज्यो सह कोइ ॥ २४६ ॥ रचना तिथि-संवत् सहससतिहत्तरह जानि। नवह कविमरि कही अमृत वाणि। गुण शुन्य चंडहाण का सुकछ पक्ष पंचमी श्रावण मास। रोहणी नक्षत्र सोहामण्ड । सो दिन तिथि जोइसा जोडह रास। टि०-प्राप्य तिथियुक्त प्रतियों में यही सबसे प्राचीन है। [ २ ] नाम-राजा वीसलदे रासा। कागज-देशी [ गुप्त स० समूह न० १५, सकेत म० ] (हाथ का बना हुआ), पत्र-सोलह पत्र दोनों तरफ लिखे हुए। आकार-८ ३/४ ईं० x ५ ईं.। पंक्तियाँ-२६ पंक्तियाँ प्रत्येक पृष्ठ पर। पद्यसंख्या-६२४। प्रकार-पुराना, पूर्ण,
  • ३ - साधारणतया ठीक; चार खण्डों में विभाजित । अक्षर- देवनागरी । सुरक्षित स्थान--विद्याप्रचारिणी जैन सभा, जयपुर । श्री अगरचन्दजी नाहटा ने 'राजस्थान भारती', पृ० ८३ में लिखा है कि "सं० १६६६ लिखित मल्हारपूर्ण गुटका हमारे संग्रह में खरीद करके संग्रह कर लिया गया है।" . पुष्पिका-ईति राजा बीसलदे रास राजमती च्यारै- खण्ड संपूर्ण भवति । संवत १६६६ वर्षे फागुण वदि १ भौमे लिखत दूधापेड़ा मध्ये राज्य श्री धीधी राजचंद्रजी राज्ये । शुभ भवतु । आदि-श्री गुरुभ्योनमः । हंसवाहण मृगलोचनी नारि । सीस समारह दिन गिणइ । शिष्य सिरजह उछिगणि धरी नारि । जाई दीहाडह झरिती ॥ १ ॥ गौरिका नंदन त्रिभुवन सार ॥ नाद देदा थारह उदर भंडार ॥ कर जोड़ नरपति कहई ॥ मूसा वाहन तिहास्यंदूर ॥ एक दन्तड मुख झलमलई । जाचिक रोहणीउ नवर सूर ॥ अन्त-जूं नारायण मिलियो चंदू । गोवल महि मिलइ ज्युं गोव्यन्द । ज्यू उणीगांयहं घरी मील्यो । गदि उहिगांण्हं बीधो दो दास । मन का मनोरथ पूरण्या । भणई खण्डइँ विणि पूज्यो आस ॥ रचनातिथि-बारह सै बहोत्तराँ हाँ मंझारि । जेठ बदी नवमी बुधवारि ॥ 'नालह" रसायन आरभइ । सारदा" तुठि ब्रह्म-कुमारि । कासमीरा कुल-मण्डणी । रास प्रकासी बीसल दे राइ । टि०-यही प्रति नागरी प्रचारिणी सभा द्वारा प्रकाशित हुई है :- [३] नाम-श्री बीसलदे रास । कागज-देशी (हाथ का बना हुया) आकार-११ इं० x ५ इं० । पंक्तियाँ-१५ से १६ प्रत्येक पृष्ठ पर । पद्यसंख्या- २७६ । प्रकार-पुराना; पूर्ण; साधारणतया ठीक । अक्षर-देव-

-- ४ --

नागरी । सुरक्षित स्थान—बीकानेर में बड़े उपासरे के बृहद्—ज्ञानभण्डार के एक गुटके में । पुष्पिका—इति श्री वीसल दे रास संपूर्णः ॥ संवत १६८१ वर्षे भाद्र सुदि ६ परणी सुत बाभरे । लिषतं चवरा ॥ सुभंभवतु ॥ आदि—श्री गुरुभ्यो नम ॥ राग केदारउ ॥ गडरि मा मदन त्रिभुवन सार । माइ मेरुइ धारइ उदर भण्डार । एक दंतउ भुज झलहलइ ! मूसका वाहण तिळक सिन्दूर । कर ज्योडि नरपति भणइ । जाणि कर रोहियो जियड सप्पड सूर । अन्त—कनरू काया जैसी कुंकु की रोल । कठिन पयोधर हेम कचोल । केलगर भुजि सी आंगुली । धारउं उद्वगाया पचइ नह कहिवाण । राणी राजा स्यु मिला । तिम पुखि संसारि मिलि ज्यो सउकोइ । रचना तिथि—नहीं है । [ ४ ] यहप्रति बालोतरा (जोधपुर राज्य) के भावर्दीय शास्त्रगच्छ भण्डार में है । इसकी पत्र सख्या ४२ और छंद सख्या २४८ है । इसका लेखन काल सं० १६८५ है । इसमें रचना काल "सयल सहस तिउतरइ" दिया है । [ ५ ] यह प्रति जैसलमेर में वृद्धिचन्द जी के संग्रह में सुरक्षित है । १४ पत्रों की इस प्रति में २४२ पद्य हैं । रचना काल का उल्लेख नहीं है। केवल भा० सु० ५ रो, का उल्लेख है । प्रति सं० १७२३ की लिखित है । [ ६ ] नाम वीसलदेव रास । कागज—देशी (हाथ का बना हुआ) । पत्र—३० पृष्ठ दोनों तरफ लिखे हुए । आकार--१० इ० x ४ १/२ इ० । पंक्तियाँ--१६ पंक्तियाँ प्रत्येक पृष्ठ पर । पद्य संख्या--२६६, चार खण्डों में क्रमानुसार ३३, ३९, १०२ और ९१ छन्द हैं । प्रकार— पुराना, अच्छी हालत में, पूर्ण ।

– ५ – लिपि—देवनागरी अक्षर । सुरक्षित स्थान—अभय जैन भण्डार, बीकानेर । पुष्पिका—संवत् १७२४ वर्षे मगयशीर वदि १५ । [ गुप्त सं० आरम्भ—सुंमम श्रीजिनाय ॥ गवरी का नंदन त्रिभोवन समूह न० १६, सार । नाववेदां थारो उद्रि भण्डार । कर जोडी नाहलो संवेत प्र० ] कवि । मूनांश वाढण तिलक सींदूर । एक दंता मुषक महि । ज्योंण कि रोहणी हठ तपे सूर । सुवण मोदो पर कामिणी । हंस गमणि मृगालोचणी नारि । सीस समारि दिन गणै । साघण उमीद्धि शम्भु हुयार । नाह न देखि चिहूंदिसा । शिख सरण्यो उजगाणा की नारि । तो ज्याय दीढाडो सूरतां ॥ अन्त—गजपगमणी तृगालोचणो नारि । सेकि संभारि दिन गणै । साधण उमीद्धे थीह हुयारि । नाह न देखू' चिहू दिशा । किण कोड हो उभगंणिया की नारि । सा जाय दीढाढा सुरता ॥ रचना तिथि—सवत् बार बाहोतरा मझारि । ज्येष्ठबदी नवमी बुधवार । नाहल रसायण आरम्भ्यो । सारदा तुठी छै ब्रह्मकुमार । कास मीशं मूपक मंडणी । रास परगांत ए बीसलराय । [ ७ ] नाम—बीसलदेव रासो ! काग़ज—देशी [ गुप्त प० ( हाथ का बना हुआ ) । पत्र—३० पत्र दोनों ओर लिखे समूह न० ६, हुए । आकार—१० इ० × ४½ इ० । पंक्तियों--११ संकेत “बी०”] पंक्तियाँ प्रत्येक पृष्ठ पर । छंद सख्या--२४८ पद । प्रकार- पुराना, अंतिम पत्र तथा अन्य पत्रो के किनारे सुसज्जित । पूर्ण । अक्षर—देवनागरी लिपि । सुरक्षित स्थान— अभयजैन भण्डार, बीकानेर । पुष्पिका—संवत् १७३७ वर्षे ज्येष्ठ सुदि १० दिने । लिखितं पडित कीर्ति विज्ञास गणिना । साध्यो राजलछमी तत्‌शिष्यश्री सुमतिलष्मी तत्‌शिष्यश्रो प्रेम लदमी पठनाय॑म् ॥

  • ३६ - आरम्भ—गरविद्या नंदनत्रिभुवन सार । नाव भेदइ सारद वदर भण्डार । एक दंतउ मुषिक अहल्लइ । मुषका बाण विसाल सिन्दूर । कर ज्योती नरपति अथइ । ज्यालि- करि रोहिणीदूह्यौ सप्पउ भूर ॥ १ ॥ वहं भत्रव न देषूं रि रवितजह्र । हंस गमणी मृगालोचनी नारि । सीस समारह्र दिन गयइ । सतविण तुमीदूह साठु दुवारि । नाह नह ज्योवइ रे बिंहूँ दिसइ । फांट सिरडयी उछगर्गाणा री नारि । ज्याइ दिहाइ उरे सुरती । एक पग आंगणी एक पग द्वार । अन्त—कनक काया तिमि कूं कूं रोल । कठिन पयोधर हेम कचोल । केलि-गरमसी कूं घडी । घाइलत्यू पष मोडइ नाङ । कंठि मोडह चाषइ गोरडी । उणकी विरह वेदना नां खडइ कोइ । जिउं राजा राणी मिल्या । हयूं नावइ कहइ मिलिज्यो सहु कोइ ॥ रचना तिथि—संवत् सहस सत्तरहइ बयालि । नालहकबीसर सरसीय बाणि । गुण गूंथ्या चउहाणका । सुकुल पषपंचमी श्रावण मास । रोहिणी नक्षत्र सोहामण्ड । सुदिन गिण जोइसी जोडियउ रास । [ ८ ] यह प्रति बीकानेर के अनूप संस्कृत लाइब्रेरी के एक गुटके में है। इसकी पद्यसंख्या २४१ है। रचना तिथि सहस सत्तहत्तरह आ० सु० ५ रो० का उल्लेख है। गुटका सं० १७५२ फा० सु० १३ को कविवर समयसुन्दर की परम्परा के ज्ञानतिलक की लिखित है। उसे गोरमष्टा पचाणण सुत जगजीवन के पठनार्थ लिखाया गया है। प्रारम्भ के दो पत्र प्राप्त नहीं हैं। [ ९ ] नाम—बीसलदे रास ! कागज—देशी [ गुप्त · पं० (हाथ का बना हुआ) पत्र—४५ पत्र दोनों तरफ लिखे रामहंस न० ९, हुए। आकार—६ इं० X ५ ३/४ इ० । पंक्तियाँ—१३ से संकेत "२०" ] १५ तक प्रत्येक पृष्ठ पर । पद्य संख्या—२५८ । प्रकार— पुराना; अच्छी अवस्था, पूर्ण । अक्षर—देवनागरी । सुरक्षित स्थान—अभय जैन भण्डार बीकानेर ।

पुष्पिका—इतिश्री सिंगार बखंन, वीसलदे रास समाप्तं ॥ संवत् १७५१ वर्षे चैत्र वदि ४ शुक्रवारं ॥ रिखी मध्ये बा० श्री ५ कनक माणिक्ये गणिजी तत्शिष्यं रतनशे- खरेण लिपि चक्रे बेगवाणी साद श्री धर्मराज जी वाचनार्थं ॥ श्री रस्तु ॥ कल्याणमस्तु ॥ आरम्भ—गवरिका नंदन त्रिभुवन सार । नाल्ह भेदइ थारे उदरि भण्डार । एक दंतउ मुपि झलहले । मूषक वाहण तिलुक सिन्दूर । कर जोडी नरपति भणै । आथि करि रोहिणी सुं तप्यो सूर ॥ १ ॥ कई मुवअन देखइ रवि वलें । अंत—कनक काया जैसी कूंको रोल । कठिन पयोधर हेमा कचोल । केलि गरभती कु भली थाइझ जि घर चै नाव । मोदि कढि घालें गोरडी । उभि की विर भेटन ना सहै कोई । जु राजा राणी मिल्या । स्युं नाल्ह कहै मिल्यौ सबु कोइ ॥ रचना-तिथि—संवत् सहस त्रिहन्तरे जाणि । नाल्ह कविसर कही अमृअ वाणि । गुण सुण्यो थउडाय फा । सुकल पक्ष पंचमी श्रावण मास । रोहिणी नक्षत्र सोहामय्यो । सो दिनं जोई जोड़सी जाड्यो रास ॥ [१०] यह प्रति बीकानेर के जयचन्द्र जी के भण्डार में विद्यमान है। इसमें कुल ३१ पत्र हैं। इसका लेखन काल चैत्र सुदि १३ शनिवार संवत् १७५६ है। इसके अनुसार ग्रन्थ का रचना काल १०३३ है। [११] यह प्रति बीकानेर के खरतर आचार्य शाखा के भण्डार में है। इसमें २५ पत्र हैं और २६१ पद्य हैं। रचना सूचक पद्य में "सहस सरदत्तरह आ० सु० ५ रा" का उल्लेख है। प्रति सं० १७७३ का० व० ११ तेजरासर में समयधर्म की लिखित है। [१२] नाम—वीसलदे चौहाण को रास । कागज-देशी (हाथ का बना हुआ) पत्रे—पच्चीस दोनों तरफ लिखे हुए । आकार—६॥ इूं० x ४ इंच्० । पंक्तियाँ- १३ से १४ पंक्तियाँ प्रत्येक पृष्ठ पर । पद्यसंख्या—२४२

– ८ – दूँद । प्रकार—पुराना; पूर्ण साधारणतया ठीक । अक्षर— देवनागरी । सुरक्षित स्थान—एशियाटिक सोसाइटी पुस्त- कालय (बंगाल) कलकत्ता । पुष्पिका=इति श्रीवीसलदे चौहान को रास समाप्तं । संवत् १७७५ वर्षे सात दी माधव पुरा मध्ये लिख्यते । कृष्ण पक्ष । प्रदोषवार माधवी रूपे केती लिखायो ॥ आरम्भ—श्री गणेशायनमः गउरिंदा नंदन त्रिभुवन सार । नाद भेदह धारइ टदर भण्डार । एक दंसठ मूचे झलहलइ । मुपगड घाइल विदारु सिंदूर । कर जोटी नरपति भणइ । जोथि करि रोहिणी जिउसपह सूर । अवदान देधुरे रचितलइ । अन्त—कनक काया निसी कुं कुं रोछ । कठिन पयोहर हेम कपोल । केहि गरम रूप की द्याछी । धोरन क्युगल मोडे माक । कढि मोटि गई गोरडी । अधिक। विरह वेदना न छडै कोइ । ज्यु राजा राणो निस्र्यो । स्यु नाहल कहै भिलिज्यो समु कोइ ॥ रचनातिथि—सवत् सहसतिहुत्तरे जांणि । नाहल कबीसर सरसीय वांणो । गुण गुप्या चौहाण का । शुक्ल पक्ष पचमी श्रावण मास । रोहिणी नक्षत्र सोहामणी । सुदिन तिथि जोडीयो रास ॥ [१३] यह प्रति बीकानेर के कृपाचन्द सूरि—ज्ञान भण्डार में (बस्ता नं० ४२) है । इसकी पत्र संख्या १४ है, और छंद-संख्या २४० है । इसका लेखन समय फागुन यदि ९ शनिशर स० १७८६ है । यह प्रति सोझत (मारवादा राज्य) में लिखी गई थी । इसमें ग्रन्थ का रचना काल ‘सवत् सत्तरतिहोत्तरे’ दिया गया है, जो संभवतः 'सहस्र त्रिहोत्तरे' के बदले भूल से लिख दिया गया है, क्योंकि १७७२ के पहले की लिखी हुई तो अनेक प्रतियां प्राप्त हो चुकी हैं ।” [१४] यह प्रति बीकानेर के खरतर आचार्य शाखा के भण्डार में १६ पत्रों की है। इसकी पद्य संख्या

२४७ है। रचना काल १०७३ लिखा हुआ है। प्रति सं० १८२६ बीकानेर में 'रतनसी' लिखित है। [ १५ ] नाम—बीसलदे रास। कागज—देशी (हाथ [ गुप्त : प० का बना हुआ)। पत्रे—पचीस। दोनों तरफ लिखे हुए समूह नं० ७, आकार—९ ३/८ इं० X ५ ३/८ इं०। पक्तियों—दस से १३ संकेत "पु०" ] पक्तियाँ प्रत्येक पृष्ठ पर । छंद संख्या—२३९ । प्रकार— पुराना फटा हुआ, पूर्ण । अक्षर—देवनागरी । सुरक्षित स्थान—अभय जैन भण्डार ( बीकानेर ) । पुष्पिका—नहीं है। आदि अन्त तथा बीच के कई पत्र दूसरे व्यक्ति के लिखे जान पड़ते हैं । प्रारम्भ—गणेशायनमः । गवरिका नन्दन त्रिभुवन सार । नाद भेदइ थारइ उदर भण्डार । एक दसत मुषिक झलहलइ । मुषका वाहण तिलक सिंदूर । कर जोडी नरपति भणई । जाणि करि रोहिणी ज्यूं तप्पत सूर ॥ अंत—कनक काया जैसी कूं कूं रोझ । कठिन पयोधर हेम कथोळ । देखि गरम सी कूंऊली । घालण ड्युं घण मोडइ नाक । कटि मोडइ घालइ गोरडी । उसुकी विरह वेवना ना लहइ कोइ । जिउ राजा रांणी मिळ्या । स्युं नावढ कहइ मिळिज्यो सहु कोइ ॥ रचना-तिथि—संवत् सहस सतिहत्तरह जांणि । नाषद कविसर सरसीय वांणि । गुण गुब्या चउहाणा का । सुबुद्ध पक्ष पचमी धावण मास । रोहिणी नषित्र सोहामयो सुदिन गिण जोईसी जोडियउ रास । प्रं०—यह प्रति स० १७२७ वाली प्रति से मिलती- जुलती है। [ १६ ] नाम—बीसलदे रास। कागज—देशी (हाथ [ गुप्त : प० का बना हुआ) पत्रे—आठ । एक पत्र भी माइटा जी समूह न० ४, द्वारा जोडा हुआ । आकार—६ ३/४ इं० X ४ ३/८ इं० । संकेत "आ०" ] पंक्तियों—बीस पक्तियाँ प्रत्येक पृष्ठ पर छंद् । सख्या—२४७ ।

  • १० - प्रकार-पूर्ण, पुरानी साधारणतया ठीक। अक्षर--देव- नागरी। सुरक्षित-स्थान अभय जैन भण्डार (बीकानेर) पुष्पिका नहीं है। आरम्भ-गवरिका नदन त्रिभुवन सार। भाद भेदह धारा उदर भण्डार। एक दंत सुपिक सलहल्लह। मुसाको वाहण तिलक सिंदूर। कर उपोटि नरपति भणइ। जाणिकि रोहणी इयुं तप्पौ सूर। अंत-कनक काया मिली कुंकुं रोज। कनक पयोधर हेम क चोज। केलि गरमसि फू धली। घाइल धण मोदह नाक। कटि मोडे चाले गोरडी। उछिक विरह वेदना न विखहे कोइ। ज्यु' राजा राणी मिल्या। स्यु' मालह कहै मिलिज्यौ सकछोह। रचना तिथि-संवत् सहसविदरे जाणिय। नाल्ह कवी सरस सरसीय बोधिय। गुण गुण्था थऊ घण का। सुकल पख्य पचमी श्रावण मास। रोहिणी नक्षत्र सोहामवण। सुदिन मित्य जोडीयो रासि। [१७] बीसलदेव चहु आण रास) कागज- देशी (हाथ का बना हुया) अक्षर-देवनागरी। छंद- संख्या-३१० । सुरक्षित स्थान-खरतरगच्छ भण्डार (कोटा)। पुष्पिका नहीं है। आरम्भ-गवरिका नंदन त्रिभुवन सार। नाइ भेदह धारइ उदर भण्डार। एक दंत सुखि सलहल्लह। मूपक वाहण तिलक सिंदूर। कर जोडी नरपति भणइ। जाणवि रोहिणी जिउ तप्पउ सूर। अंत-कनक कनि सउं कुडुम रोज। कठिन पयोधर हेम कचोल। वेलि गरम मिसि फूंकली। घाइल जिम घण मोदहू जी नाक। कटिम मोड चाढल गोरडी। उलहइ विरह की वेदना नहिं खलइ कोइ। राणी ही राजा जिमि मिल्या। तिम नल्लह कहै मिळण्वी सहु कोइ ।
  • ११ - रचना-तिथि—संवत् तेरसत्तौतरै जाणि । भसह कविसर सरसीय बांणि । गुहगुथ्या बहुभाण का । सुक पंचमी नह श्रावण मास । हस्त नक्षत्र रविवार सुं शुभ दि जोसी से जोडियउ रास । [ गुप्त : पं० समूह नं० २, संकेत "मू०" ] [ १८ ] नाम—बीसलदे रास । कागज—देशी का बना हुआ । पन्ने—दो दोनों तरफ लिखे हुए । आकार— १० इं० × ४३/८ इं० । पंक्तियाँ—सत्तरह प्रत्येक पृष्ठ पर । छन्द-संख्या—३८ सुद्ध पूरे तथा ३९ वें का प्रारम्भ । प्रकार—पुराना, प्रायः ठीक, अपूर्ण । अक्षर--देवनागरी । सुरक्षित स्थान—अभय जैन भण्डार (बीकानेर) । पुष्पिका नहीं है । आरम्भ—गउरि का नन्दन त्रिभुवन सार । नाव भेसइ धारइ उदर भण्डार । एक दन्तो सुपिक सजलदछई । मूंसाको वाहण तिळक सिंदूर । कर ज्योडी नरपति भणै । उयाण करि रोहणी जिम तप्पी सूर । अन्त—दरिण मरण सम्मन्यो जगंनाथ । आइ पउतली त्रिभुवन नाथ । सण धक गदाधरी । माँसि हे दिश्ण की मनह विचारि । हेतूं विवरण पाइउये । स्वामी पूरब देस की जवनम निवार । ३८ । पूरव देस को कव कुंछोक । पान फू......। [ गुप्त : पं० समूह नं० ८, संकेत 'मा' ] [ १९ ] नाम—बीसल देव रासो । कागज—देशी ( हाथ का बन(हुआ) । पन्ने—ग्यारह दोनों तरफ लिखे हुए । आकार—१०३/८ इं० × ५३/८ इं० । पंक्तियां—सत्रह प्रत्येक पृष्ठ पर । छन्द संख्या—४० तथा एक अपूर्ण । प्रकार— पुराना । अपूर्ण । साधारणतया ठीक । अक्षर—देवनागरी । सुरक्षित स्थान—अभय जैन मण्डार (बीकानेर) पुष्पिका नहीं है । आरम्भ—गवरिका नन्दन त्रिभुवन सार । नाव भेसइ धारइ उदरि भंडार । एक दंतउ सुपिक सजलछह । मूसका वाहन सिळक सिन्दूर । कर जोडी नरपति भणइ । बाण करि रोहिणी स्युं तपइ सूर ॥१॥
  • १५ - अंत—बापगे सबली भूवलो। धरिरंग धीषा बोबो- पह दीरि। नदी संदेलो समावड दीयड। सहाउद्द मद्दइ बंघूवह भीमवडह चौकि ॥४५०॥ शुभरह दसइ......... [ २० ] नाम—पीगल दे रास। कागज—देशी [ युक्त : पं० (हाथ का बना हुवा) पत्र-चार (दोनों तरफ लिखेहुए) आकार समूह सं० ५, १० इंच० × ४३/८ इंच० । पंक्तियां-२० से २८ प्रत्येक पृष्ठ पर। छंद रहित "पा०" ] संख्या-२७७छन्द। प्रकार-पुराना, पूर्ण, साधारणतया ठीक। अक्षर—देवनागरी । ( बहुत छोटे छोटे लिखे हुए ) सुरक्षित स्थान—अभय जैन भण्डार (बीकानेर) । इति वीसलदे रासः । समाप्तः । आरम्भ—गवरिका नन्दन त्रिभुवन सार। मात भेदइ धारा उदर मण्डार। एक दंतड शुषिक ललहलइ । सुषक बाहण तिलक सिन्दूर। कर जोडी नरपति भयइ । जांबिकि रोहिणी ज्युं सप्यो सूर । अंत—धन्य हो पंडित्या धन्य हो राइ । धन्य हो जोगी दरसणी। वेग मेछावड घण कठ नाइ । धन्य दिहाडो भाज कठ । रांधी राजमती मिलवड वीसल राउ । ॥४५॥ कनक पयोधर हेम कपोल। केलि गरभेही कूं घणो । घाइल ज्यूं घण मोहइ नाइ । कडि मोहइ चाले गोरडी। इनि को विरह वेदना नपि छहइ कोइ । ज्यू राजा राणी मिल्या । खुं नाहइ कठे मिलड्यो सऊ कोइ ।। रचना तिथि—संवत् सहस तिहत्तरइ जाणि। नाहइ कवि सरसीप पाणि। शुक्ल सुष्या भांण का। सुफल पञ्चमी श्रावण मास। रोहिणी नक्षत्र सोभामबउ । सुदिन गिण जोडीयो रास । [ २१ ] नाम—बिसलदे रास । कागज—देशी ( हाथ का बना हुआ ) पन्ने—अट्ठारह ( दोनों तरफ लिखे हुए ) । आकार—१०३/४ इं० × ४३/४ इं० । पक्तियों— तेरह पंक्तियां प्रत्येक पृष्ठ पर । छंद संख्या—२५० छन्द तथा दो पंक्तियां अतिरिक्त । प्रकार—पुराना । अपूर्ण ।
  • १५ -

अक्षर—देवनागरी । सुरक्षित स्थान—अभय जैन भण्डार (बीकानेर) पुष्पिका......नहीं है । आरम्भ—श्री वीतरागायनम । गवरि का नन्दन त्रिभुवन सार । नाद भेद थारे उदर भण्डार । एक दंतौ सबदले । मुसा की वाहण तिळक सिन्दूर । कर जोडी नरपति भणै । जाखि केरि रोहिणी ज्यू संप्यौ सूर । अन्त—चोर परसा घरि आवियोनाइ । हीयडे हांथ छक भरि याह । भयली सबली करे सुपणी । अति रति भरि राजा छीयड ढीग । सही सहेली चमकौ हुधौ । झा को गैरव को कचड बोओ भीनो छै पीक ॥ २५० ॥ हठ हठ हसे थालिंगण देइ । पलिंग बेसे नै र्पान न लेइ । डुभी देह डलमला । तोडे छै अंगुली मोडे छै बाह । पुरुष भरोसो ना करू । चरत यारद्द...... [ २२ ] यह प्रति बीकानेर स्थित चतुर्भुज जी के ग्रन्थ-संग्रह में (बस्ता न० ५) है । इसमें १७ पत्रे हैं । ग्रन्थ का रचना काल "सहस तिहुत्तरे दिया" हुआ है । यह उन्नीसवीं शताब्दी की लिखी हुई है । [ २३ ] यह प्रति बीकानेर के दान सागर भण्डार में (बस्ता नं० १४) है । इसमें पत्र संख्या २३ और छन्द संख्या २८० है । प्रत्येक पृष्ठ में १३ पंक्ति और प्रति पंक्ति में ३५ से ४० अक्षर हैं । यह प्रति भी १९ वीं शताब्दी की लिखी हुई है । इसमें भी रचना काल 'सहस तिहुत्तरे' है । [ २४ ] यह प्रति जैसलमेर के जैन भद्र सूरि ज्ञान भण्डार में है । इसकी पत्र संख्या ११ तथा पद्य संख्या २०२ है । रचना काल सूचक पद्य नहीं है । प्रति के प्रथम पत्र का लेखन भिन्न है, अवशेष पत्र १७ वीं के लिखित प्रतीत होते हैं— [ २५ ] यह प्रति जैसलमेर के बड़ा भण्डार—न० ५१९ में है । इसमें २८३ पद्य हैं । रचना काल 'सहस तिहुत्तरे' दिया गया है ।

  • १४ - [ : ६ ] यह प्रति बीकानेर के बड़े उपासरे के महरचन्द भण्डार में है। इसका अन्तिम पन्ना (सं० १३) पहले प्राप्त हुआ था लेकिन श्री नाहटा जी के कथनानुसार इसके अन्य १२ पन्ने कलकत्ते के राय बद्री दास म्यूजियम में प्राप्त हो गये । इस प्रकार यह प्रति भी पूर्ण हो गई । इसमें छंदसंख्या ३१० है। प्रत्येक पृष्ठ पर १८ पंक्तियाँ तथा प्रति पंक्ति में ६० से ६५ तक अक्षर हैं । अन्त में "ग्रन्था ग्रन्थ १००" लिखा है । इसमें रचना सूचक पद्य 'कोटा' के भण्डार की प्रति के समान नहीं है । [ : ७ ] नाम विसलदे चौहाण को रास । कागज - देशी ( हाथ का बना हुआ ) दोनों तरफ लिखे हुए । पत्र... ... ११ । आकार १० ई० X ४ ई० पंक्तियों......तेरह, प्रत्येक पृष्ठ पर । छंद संख्या - २४२; प्रकार - नया । पूर्ण साधारणतया ठीक । अक्षर - देवनागरी । सुरक्षित स्थान - एशियाटिक सोसाइटी ( बंगाल ) कलकत्ता । पुष्पिका - इतिश्री विमलदे चौहाण को रास समाप्त संवत् १७०५ का साल थी मालपुरा मध्ये लिख्यते कृषण पक्ष असीतवार साध्वी कनकंगी लिखायो । लिखतं जोधपुर मध्ये साधु पाला रामेण विक्रम संवत् १६०२ फागुन सुदि ६ शनिवासरे । ईस्वी सन् १९१५ के दूसरी तारीख २० जैना- चार्य श्री धर्म विजय जी की भेजी हुई पुस्तक से लिखी । आदि-गउरि का नन्द त्रिभुवन सार । नाइ भेवइ थारइ उदर भण्डार । एक दंतउ मुषिक छछहछइ । मुसकउ बाहण तिलक सिन्दूर । कर जोडी नरपति भणइ । आणि करि रोहिणी जिउं तपइ सूर । अन्त-कनक काया जैसी कुंकुं रोल । कठिन पयोधर हेम क घोल । केसि सरस रूप की पागली । घाइल ज्युं घण मोडे नाक । कडि मोडे बाली गोरडी । उलिखी विरह वेदना न सहे कोइ । ज्युं राजा राणी मिल्या । रघु नान्द कहे मिळियसी सहु कोइ ।
  • १५ - रचना तिथि—संवत् सहस विहूतरे जांणि । नाइह फणीसर सरसीय घांणी । गुण गूथ्या चौहाण का । सुकल पक्ष पञ्चमी श्रावण मास । रोहिणी नक्षत्र सोहामखौ । सुदिन रीखी जोडीयो रास । द्रः—यह प्रति बारह सं० की प्रति की नकल जान पडती है । उपर्युक्त प्रतियों में से १६ प्रतियों के आधार पर डा० माता प्रसाद जी गुप्त ने इसका एक सुन्दर सम्पादित संस्करण हिन्दी परिषद् विश्वविद्यालय, प्रयाग से सन् १६५३ में प्रकाशित करवाया है । इस संस्करण में उन्होंने प्रतियों को उनके पाठसाम्य के आधार पर पाँच समूहों में रखा है । प्रत्येक समूह का नामकरण उन्होंने उस समूह में रखे गये प्रथम ग्रन्थ के संकेताक्षर से किया है । इन पाँचों समूहों की प्रतियाँ डा० गुप्त के मतानुसार कम से कम पाँच पाठ प्रस्तुत करती हैं जिनमें मिलाकर..... लगभग पौने पाँच सौ छन्द आते हैं । इन छन्दों में से केवल २७, २८ प्रतिशत छन्द उनके मतानुसार प्रामाणिक माने जा सकते हैं । प्रत्येक समूह के छन्दों की संख्या की तुलना अन्य समूह के छन्दों की संख्या से करते हुए डा० गुप्त ने कुल १२८ छन्दों को ही प्रामाणिक माना है । इनमें से भी ११८ छन्द तो तीन समूहों में पाये जाते हैं तथा दस ऐसे हैं जो तीन समूहों में से केवल दो ही में पाये जाते हैं ।¹ इस सम्पादित प्रति के पहले की एक और सम्पादित प्रति है जिसका उल्लेख किया जा चुका है । उस प्रति में किसी भी हस्तलिखित प्रति का तुलनात्मक अध्ययन नहीं प्रस्तुत किया गया है । केवल जयपुर में प्राप्त सं० १६६३ में लिखी गई प्रति का संपादन कर दिया गया है ।— श्री अगरचन्द जी नाहटा ने प्राप्त हस्तलिखित प्रतियों का उल्लेख करते हुए उसके दो रूपान्तरों का वर्णन किया है और बताया है कि दोनों रूपान्तरों में काफी भिन्नता पायी जाती है ।² प्रस्तुत संपादन कार्य डा० गुप्त के कार्य को मान्यता देते हुए भी अपने ढंग से किया गया है । डा० गुप्त ने आज तक की प्राप्त हस्तलिखित प्रतियों में से सबसे पुरानी प्रति सं० १६३३ वाली को भी आधार नहीं माना है । उन्होंने उसमें आये हुए छन्दों में से सिर्फ उन्हीं को प्रामाणिक माना है जो उनके द्वारा विभाजित समूहों में से प्राय सभी समूह की प्रतियों में प्राप्य हैं । लेकिन इस (१) बीसलदेवरासो...सं० डा० माता प्रसाद गुप्त...पृ० ४८ (२) राजस्थानी... (त्रैमासिक पत्रिका) भाग ३, अंक—३ पृ० १८ ।
  • १६ -

मात्र को मान लेने पर सबसे टेढ़ा प्रश्न यह उठ खड़ा होता है कि सं० १६३३ वाली प्रति में आये हुए छन्दों में जिनकी संख्या २७६ है, केवल १२८ को ही कैसे प्रामाणिक मान लिया जाय । चूंकि यह प्रति आज तक की प्राप्य प्रतियों में सबसे प्राचीन है, इसलिये उचित तो यही होगा कि इसके सभी छन्दों को प्रामा- णिक माना जाय । इसके बाद वाली प्रतियों में जो छन्द इसके नहीं प्राप्य हैं, उनके सम्बन्ध में ऐसा समझना होगा कि परवर्ती लेखकों को वे छन्द या तो ज्ञात नहीं हुए अथवा ज्ञात होते हुए भी उन लेखकों ने उन छन्दों को छोड़ दिया हो और स्वरचित छन्दों को जोड़ दिया हो । इसी आधार को ध्यान में रखकर सं० १६३३ की लिखी हुई प्रति को प्रामाणिक माना गया है । उसमें आये हुए सभी छन्दों को प्रामाणिक मानते हुए प्राप्य २७ प्रतियों को उनकी पुरावता के आधार पर चार समूहों में विभाजित किया गया है । कार्य की सुविधा के लिये इन चार समूहों का संकेताक्षर क्रमशः 'अ', 'आ', 'क' एवं 'ख' रखा गया है । (१) 'अ' समूह— इस समूह में उन सभी प्रतियों को स्थान दिया गया है, जो १७ वीं शताब्दी की हैं । परिचय पत्र में इनकी संख्या १ से ५ तक है । (२) 'आ' समूह— इस समूह में वे सभी प्रतियाँ आती हैं, जो अट्ठारहवीं शताब्दी की हैं, तथा जिनकी संख्या परिचय पत्र में ६ से १३ तक है । (३) 'क' समूह— यह समूह १६ वीं शताब्दी की लिखित प्रतियों का है । इसमें परिचय पत्र के अनुसार केवल एक प्रति सं० १४ वाली आती है । (४) 'ख' समूह— इस समूह में परिचय पत्र की शेष संख्या १५ से २७ तक की वे सभी प्रतियां हैं, जिसका लेखन काल ज्ञात नहीं है । उपर्युक्त विभाजन के अनुसार (१) 'अ' समूह में डा० गुप्त की 'प०' समूह की नं० ३ संकेताक्षर 'प०' तथा 'सं०' समूह की नं० १४ संकेताक्षर 'सं०' वाली प्रतियाँ आती हैं । (२) 'आ' समूह में डा० गुप्त की 'सं०' समूह की नं० १६ संकेत 'प्र०', प० समूह की नं०-६ संकेत 'की०' तथा नं० ६ संकेत 'र०' वाली प्रतियाँ आती हैं । (३) 'क' समूह में डा० गुप्त के की कोई प्रति नहीं आती । (४) 'ख' समूह में डा० गुप्त के 'प०' समूह नं० ६

२ - १७ - संकेत 'प्र०' नं० ५ संकेत 'आ' नं० ८ संकेत 'आ०', नं० ५ संकेत 'घा०' तथा 'म०' समूह की न० २ संकेत 'मृ' प्रतियाँ आती हैं। इस तुलनात्मक अध्ययन से इस निष्कर्ष पर पहुँचा जाता है कि उपर्युक्त चार समूहों में से तीन समूहों में डा० गुप्त के दो समूहों 'प०' अथवा सं० समूह की कोई न कोई प्रति अवश्य है। विशेष रूप से 'घ' समूह में तो डा० गुप्त के 'पं०' तथा 'सं०' दोनों समूहों की प्रतियाँ हैं। डा० गुप्त के 'प०' समूहकी न०-३ प्रति स० १६३३ की लिखी हुई है जिसे यहाँ 'भ०' समूह में रखा गया है; क्योंकि कथित विभाजन के अनुसार यह प्रति १७ वीं शताब्दी की है और सबसे प्राचीन प्राप्य प्रति है। डा० गुप्त ने अन्य जिन प्रतियों को इस समूह (प० समूह) में रखा है उनमें से सं० १७२७ और १७५१ वाली प्रतियों को छोड़कर जिन्हें यहाँ 'आ' समूह में १८ वीं शताब्दी की होने के कारण रखा गया है, प्राय किसी भी प्रति में पुष्पिका नहीं है। ऐसी प्रतियों की संख्या इस समूह में पाँच है। जिन प्रतियों में पुष्पिका नहीं है, वे किस संवत् में लिखी गईं यह एक विवादा- त्मक प्रश्न है। अतएव उनको इस संपादन कार्य में विशेष स्थान नहीं दिया गया है। पुष्पिका के अभाव के कारण ही ये प्रतियाँ यहाँ 'ख' समूह में रखी गई हैं। डा० गुप्त के 'सं०' समूह की १६६१ वाली प्रति (नं० १५) भी कथित 'घ' समूह में आती है जैसा कि ऊपर कहा जा चुका है। 'सं०' समूह में डा० गुप्त ने इस प्रति के अतिरिक्त एक और प्रति को रखा है जिसकी संख्या १५ है तथा संकेताक्षर 'प्र०' है। इस प्रति को यहाँ 'आ०' समूह में रखा गया है क्यों- कि यह संवत् १७२४ की लिखी है। इन दोनों समूहों के अतिरिक्त डा० गुप्त के तीन अन्य समूहों की प्रतियों में से 'म०' समूह की एक प्रति न २ संकेताक्षर 'म०' यहाँ 'घ' समूह में रखी गई है क्योंकि इसमें भी पुष्पिका का अभाव है। इस 'ग०' समूह की एक प्रति और है जिसका पूर्ण विवरण प्राप्त न होने के कारण न तो उसका परिचय पत्र में ही उल्लेख किया है और न उसे किसी समूह स्थान ही दिया गया है। दूसरा समूह "म०" समूह है जिसकी केवल एक प्रति प्राप्य है और वह भी किसी अन्य प्राचीन प्रति की प्रतिलिपि है तथा पुष्पिका का अभाव है, साथ ही अनेक त्रुटियाँ भी हैं। अतएव इसका तथा तीसरे समूह 'अ०' में आने वाली दो प्रतियों का भी उल्लेख इन्हीं कारणों में से किसी एक के कारण परिचय पत्र में नहीं किया गया है। कथित समूहों तथा डा० गुप्त के समूहों के तुलनात्मक अध्ययन के पश्चात् (१) बीसलदेव रासो-सं०-माताप्रसाद गुप्त-पृ० ३-१२।

१. प्रथम खण्ड: राजा बीसलदेव एवं मालवा राजकन्या राजमती विवाह

– १८ – इसी निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ता है कि 'बीसलदेव रासो' की प्रतियों के दो रूपान्तर हैं।$^१$ एक तो वह जो चार खण्डों में विभक्त है और दूसरा वह जिसमें खंडों का विभाजन नहीं है। इन रूपान्तरों में उपर्युक्त भिन्नता के अतिरिक्त और भी कुछ विशेष बातें द्रष्टव्य हैं। दोनों रूपान्तरों की कुछ विशेषताएँ खण्डों में विभाजित प्रतियाँ:-- खण्डों में अविभाजित प्रतियाँ :— (१) कथा चार खण्डों में समाप्त (१) केवल तीन खण्डों की कथा ही होती है। प्राप्य है। (२) माघ, कालिदास आदि पंडितों (२) इन नामों का अभाव है। का नाम आता है। (३) उड़ीसा यात्रा में साथ जाने (३) इन नामों का उल्लेख नहीं है। वाले सरदारों के नाम गिनाये गए हैं। (४) राजा के उड़ीसा जाने का मुहूर्त (४) रानी ज्योतिषी से चार माह रानी ज्योतिषी से एक माह बाद बाद का मुहूर्त राजा को देने के कर देने को कहती है। लिए कहती है। (५) वर खोजने के लिए जैसलमेर (५) यह वर्णन इस रूपान्तर की आदि जाने का विस्तृत वर्णन है। प्रतियों में विस्तार से नहीं है। (६) इस रूपान्तर की प्रतियों में (६) इस रूपान्तर में ग्रन्थ के शेष में रचनाकाल-सूचक पद्य ग्रन्थ रचना-सूचक पद्य आया है। के आदि में है। ऊपर प्राप्य हस्तलिखित प्रतियों का विभाजन काल के अनुसार चार समूहों में किया गया है। प्रत्येक समूह की प्रत्येक प्रति उपर्युक्त दोनों रूपान्तरों में से किस रूपान्तर में आती है उसे निम्न रूप में स्पष्ट किया जा सकता है :— समूह खण्डों में अविभाजित खण्डों में विभाजित 'अ' संख्या १, ३, ४, संख्या २ 'आ' " ५, ७, ८, ९ " ६, १०, ११, १२, १३, ────────────────────────────────────────── (१) राजस्थानी—३रा भाग, अंक २, पृ०-१८।